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Shri All India Swetamber Sthanakwasi Jain Conference

आचार्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.

चतुर्थ आचार्य सम्राट्

जीवन परिचय

आचार्य से जुड़ी प्रमुख जानकारी और विवरण

चतुर्थ आचार्य सम्राट् आचार्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.

जन्म नाम: शिव कुमार

पिता: श्री शिवलाल जी जैन

माता: श्रीमती हिम्मतबाई जी

जन्म दिनांक: 18 दिसम्बर, 1942

जन्म स्थान: रौटिया (हरियाणा), तहसील एवं ज़िला गुड़गांव; मूल परिवार गुड़सदन – पंजाब

वंश: बंसल ओसवाल

शिक्षा: एम.ए. (अंग्रेज़ी माध्यम), पी.एच.डी., डी.लिट. (मानद), जैन विद्या, तत्वज्ञान और योग विषयों में विशिष्ट अध्ययन

दीक्षा: गुरुदेव शिवाचार्य पूज्य श्री शांतिमुनि जी महाराज के पावन सान्निध्य में

चादर महोत्सव: 17 मई, 1972

आचार्य पदारोहण: 9 जून, 1999, अहमदनगर (महाराष्ट्र)

आयु: दीर्घ साधना, संयम और अध्यात्म-साधना से विभूषित जीवन

विहार क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर आदि

विशिष्ट सम्मान एवं अलंकरण

  • डॉ. A.P.J. Abdul Kalam World Peace Award 2020
  • Golden Book of World Record — Largest Number of Workshops on Meditation
  • विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान और अभिनंदन

आचार्य श्री की प्रेरणा से संचालित प्रमुख कार्य

  • अहिंसा यात्रा अभियान (विशेषतः 2015)
  • आत्म-ध्यान साधना का व्यापक प्रसार
  • प्रेक्षा, ध्यान, योग और जीवन-विकास प्रशिक्षण शिविर
  • शिक्षा, सेवा, नशामुक्ति, शाकाहार और नैतिक जागरण अभियान
  • आत्मकल्याण एवं विश्वशांति के लिए जन-जागरण

संस्थाएँ एवं प्रेरित उपक्रम

  • आत्म ध्यान साधना परिवार
  • विभिन्न आध्यात्मिक एवं जीवन-विकास प्रशिक्षण केन्द्र
  • ध्यान, योग, आत्म-जागरण और व्यक्तित्व-विकास शिविर
  • समाजसेवा, स्वास्थ्य, नैतिकता और मानव-एकता पर केन्द्रित प्रकल्प

प्रेरक व्यक्तित्व और कार्यक्षेत्र

आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्तमान युग के उन संत-मनीषियों में अग्रगण्य हैं, जिन्होंने जैन धर्म, अध्यात्म, ध्यान, योग, आत्म-अनुशासन और जीवन-दर्शन को व्यवहार से जोड़कर जन-जन तक पहुँचाया। आपके व्यक्तित्व में गहन आध्यात्मिक साधना, प्रखर चिंतन, सहज करुणा, स्पष्ट अभिव्यक्ति, अनुशासन, संगठन-शक्ति और व्यवहारिक जीवन-दृष्टि का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

आपने जैन समाज ही नहीं, अपितु व्यापक मानव-समाज को यह संदेश दिया कि धर्म केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है। आत्मबोध, आत्म-शोधन और आत्म-नियंत्रण के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक, सन्तुलित और उपयोगी बना सकता है। आपने अध्यात्म को रहस्य नहीं रहने दिया, बल्कि उसे प्रयोग, अनुभव और आत्म-विकास का जीवंत विज्ञान बनाया।

धर्म-पथ पर प्रवेश

बाल्यावस्था से ही आपके भीतर वैराग्य, चिंतनशीलता और साधु-वृत्ति के संस्कार विकसित होने लगे थे। 18 दिसम्बर, 1942 को जन्म लेने वाले इस तेजस्वी बालक ने अल्पायु में ही संयम, अध्ययन और आत्म-अनुशासन के प्रति विशेष झुकाव प्रकट किया। क्रमशः आध्यात्मिक चिंतन और साधना के प्रति आकर्षण बढ़ा, और यही अंततः आपको दीक्षा-पथ की ओर ले गया।

गुरुदेव शिवाचार्य पूज्य श्री शांतिमुनि जी महाराज के सान्निध्य में आपने दीक्षा ग्रहण कर संयम-जीवन को स्वीकार किया। दीक्षा के पश्चात् आपका जीवन अध्ययन, साधना, अनुशासन और लोकमंगल की भावना से ओत-प्रोत हो उठा।

शिक्षा, अध्ययन और बौद्धिक योगदान

आचार्य श्री ने पारंपरिक धार्मिक अध्ययन के साथ आधुनिक अकादमिक अनुशासनों में भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। आपने एम.ए., पी.एच.डी. और डी.लिट. जैसी उपाधियों से स्वयं को समृद्ध किया। भारतीय धर्मों, विशेषतः जैन दर्शन, आत्मा-तत्व, मोक्षमार्ग, ध्यान-साधना और आत्मानुशासन पर आपका गहन अधिकार स्थापित हुआ।

आपका विद्वत्त्व केवल शास्त्रज्ञान तक सीमित नहीं रहा। आपने जटिल दार्शनिक विषयों को सरल भाषा, प्रासंगिक उदाहरणों और व्यवहारिक दृष्टि से प्रस्तुत किया। इस कारण आपका साहित्य साधु-साध्वी वर्ग, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों सभी के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ।

आत्म-ध्यान साधना का प्रसार

आचार्य श्री का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान “आत्म-ध्यान साधना” का सशक्त प्रतिपादन और व्यापक प्रसार है। आपने आत्म-ध्यान को केवल दार्शनिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि जीवन-परिवर्तन की व्यवहारिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया। आपके अनुसार आत्म-ध्यान का उद्देश्य व्यक्ति को स्वयं से जोड़ना, अपने भीतर की शांति और शक्ति को पहचानना तथा जीवन को संतुलित और जागरूक बनाना है।

आपके मार्गदर्शन में देश के अनेक भागों में आत्म-ध्यान, योग, श्वास-जागरूकता, भाव-परिवर्तन, आत्म-अवलोकन, व्यक्तित्व-विकास और जीवन-प्रबंधन पर प्रशिक्षण शिविर आयोजित हुए। इन शिविरों ने हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए। आत्म-ध्यान साधना के माध्यम से आपने मानसिक तनाव, असंतुलन, अवसाद, हिंसक प्रवृत्ति और आत्म-विस्मृति जैसी समस्याओं के समाधान की दिशा दिखाई।

आत्म-शांति से विश्व-शांति तक

आपने यह स्पष्ट किया कि विश्व-शांति का आधार व्यक्ति की आंतरिक शांति है। जब तक मनुष्य स्वयं अशांत, असंतुलित और असंयमित रहेगा, तब तक समाज और विश्व में स्थायी शांति संभव नहीं है। इसलिए आपने व्यक्ति को स्वयं पर कार्य करने, आत्म-विकास को प्राथमिकता देने और जीवन में संयम, करुणा, मैत्री, प्रेम तथा सत्यनिष्ठा विकसित करने का संदेश दिया।

आपकी दृष्टि में धर्म का अर्थ पलायन नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को जागरूकता और मूल्यों से भर देना है। यही कारण है कि आपने परिवार, समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, नैतिकता, पर्यावरण, मानवीय संवेदना और जन-जीवन से जुड़े विविध विषयों पर भी सतत मार्गदर्शन दिया।

अहिंसा, शाकाहार और नैतिक चेतना

आचार्य श्री ने अहिंसा को जीवन का मूल स्वर बताया। आपने केवल सिद्धान्त रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक अभियान के रूप में भी अहिंसा, शाकाहार, नशामुक्ति और नैतिक जीवन के पक्ष में लोगों को प्रेरित किया। “अहिंसा यात्रा” जैसे अभियानों के माध्यम से आपने समाज में संवेदनशीलता, दया, करुणा और जीव-मात्र के प्रति आदरभाव जागृत किया।

आपने बार-बार कहा कि मनुष्य की श्रेष्ठता केवल ज्ञान में नहीं, बल्कि उसके आचरण में है। शाकाहार, संयम, अनुशासन और आत्म-नियंत्रण केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि मानवीय उन्नयन के साधन हैं।

आचार्य पद और संगठनात्मक नेतृत्व

9 जून, 1999 को अहमदनगर (महाराष्ट्र) में आपका आचार्य पदारोहण हुआ। इसके साथ ही आपने श्रमण संघ के नेतृत्व को साधना, समन्वय, संगठन और दूरदर्शी अध्यात्म-दृष्टि से नई ऊर्जा दी। आपने संघीय मर्यादाओं, आचार-विनय, साधना-शुचिता और अनुशासन पर विशेष बल दिया।

आपके नेतृत्व में श्रमण संघ और अधिक सुदृढ़ हुआ। आपने युवा पीढ़ी, शिक्षित समाज, शोध-जगत और आधुनिक चिंतन से जुड़े लोगों तक भी जैन सिद्धांतों को पहुँचाने का कार्य किया। इस प्रकार आपने पारंपरिक अध्यात्म और समकालीन जीवन के बीच सेतु का कार्य किया।

प्रवचन शैली और प्रभाव

आपकी प्रवचन शैली अत्यंत प्रभावशाली, तर्कपूर्ण और हृदयग्राही मानी जाती है। आप गूढ़ विषयों को भी अत्यंत सरल, उदाहरणपूर्ण और प्रेरक शैली में प्रस्तुत करते हैं। आपके शब्दों में केवल ज्ञान नहीं, अनुभव की प्रामाणिकता और साधना की ऊष्मा अनुभव होती है। इसी कारण श्रोता केवल सुनते ही नहीं, भीतर से प्रभावित भी होते हैं।

आपके प्रवचनों का केंद्र-बिंदु आत्म-जागरण, आत्म-निरीक्षण, आत्म-नियंत्रण, करुणा, शांति, संयम, सह-अस्तित्व, धर्म-समन्वय और जीवन की सार्थकता है। आपने धर्म को लोक-व्यवहार से जोड़ा और यह दिखाया कि अध्यात्म व्यक्ति को अधिक सजग, अधिक दयालु और अधिक जिम्मेदार बनाता है।

साहित्य-साधना

आचार्य श्री का साहित्य-क्षेत्र अत्यन्त समृद्ध है। आपने ध्यान, योग, जैन दर्शन, मोक्षमार्ग, आत्मचिंतन, आत्म-विकास, शाकाहार, नैतिक जीवन, व्यवहारिक अध्यात्म तथा जीवन-प्रबंधन से जुड़े अनेक हिन्दी और अंग्रेज़ी ग्रंथों का सृजन किया है।

मुख्य हिन्दी कृतियाँ
  • आत्मध्यान विज्ञान
  • योग और संस्कार
  • सत्य और जीवन
  • जीवन की कला
  • ध्यान और मुक्ति
  • आत्मा का विज्ञान
  • समता और साधना
  • अहिंसा और मानवता
मुख्य अंग्रेज़ी कृतियाँ
  • The Doctrine of Liberation in Indian Religions with Special Reference to Jainism
  • Spiritual Practices of Lord Mahavira
  • Return to Self
  • The Jaina Pathway to Liberation
  • The Fundamental Principles of Jainism
  • The Doctrine of the Self in Jainism
  • The Jaina Tradition
  • The Doctrine of Karma & Transmigration in Jainism
  • Self Development by Meditation
  • Self Meditation (Nature and Practice)

शोध एवं अकादमिक योगदान

आपने भारतीय धर्मों में मुक्ति-विचार, जैन तत्वमीमांसा, आत्म-साधना, योग, ध्यान, कर्म-सिद्धांत और व्यक्तित्व-विकास जैसे विषयों पर उल्लेखनीय अकादमिक योगदान दिया। आपके शोध और व्याख्यानों ने जैन अध्ययन को आधुनिक शोध-परिप्रेक्ष्य में प्रतिष्ठित किया। इसीलिए विद्वत् जगत में भी आपको विशेष सम्मान मिला।

योग, ध्यान और जीवन-विकास

आचार्य श्री ने यह प्रतिपादित किया कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्म-संतुलन का विज्ञान है। आपने योग को ध्यान, भाव-परिवर्तन, श्वास-जागरूकता और नैतिक जीवन से जोड़ा। आपके शिविरों में व्यक्ति को केवल आसनों का प्रशिक्षण नहीं मिलता, बल्कि विचार-शुद्धि, भाव-निर्माण और जीवन-दृष्टि का विकास भी होता है।

आपने यह संदेश दिया कि यदि मनुष्य अपने भीतर उतरना सीख ले, अपने विचारों को समझे, भावों को दिशा दे और जीवन में सजगता लाए, तो वह तनाव, भ्रम और विक्षेपों से ऊपर उठकर संतुलित जीवन जी सकता है। यही आपका ध्यान-दर्शन है, जो साधना को जीवन की धुरी बनाता है।

सामाजिक दृष्टि और लोकमंगल

आचार्य श्री की साधना केवल व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं है। आपने सदैव लोकमंगल को ध्यान में रखकर कार्य किया। समाज में नैतिकता, सद्भाव, पारिवारिक मूल्यों, मानवीय एकता, करुणा और आत्म-सम्मान के विकास पर आपने विशेष बल दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य, नैतिक पुनर्जागरण और समाज-निर्माण के क्षेत्रों में आपकी प्रेरणा से अनेक कार्यक्रम संचालित हुए।

आपने युवाओं को आत्मविश्वास, अनुशासन और सकारात्मक दृष्टि अपनाने का संदेश दिया। महिलाओं, बच्चों और गृहस्थ समाज के लिए भी आपके प्रवचन अत्यन्त प्रेरक रहे हैं। आपने जीवन को संघर्ष नहीं, साधना का अवसर बताया।

चातुर्मास एवं व्यापक जनसम्पर्क

आचार्य श्री ने देश के अनेक नगरों और राज्यों में चातुर्मास कर धर्म, ध्यान और आत्मविकास का संदेश फैलाया। पृष्ठ 5–6 में उल्लिखित विवरण के अनुसार आपके चातुर्मास पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश आदि अनेक क्षेत्रों में हुए, जिससे व्यापक समाज लाभान्वित हुआ। इन चातुर्मासों के माध्यम से आपने साधना-शुचिता, अनुशासन, धर्मचिन्तन और समाज-जागरण की परम्परा को सशक्त किया।

समग्र व्यक्तित्व

आचार्य डॉ. श्री शिवमुनि जी महाराज का व्यक्तित्व अध्यात्म और आधुनिकता, साधना और बौद्धिकता, परम्परा और प्रयोग, करुणा और अनुशासन का अद्वितीय समन्वय है। आप केवल जैन समाज के ही नहीं, व्यापक मानव-समाज के लिए प्रेरणा-पुरुष हैं। आपके जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि धर्म तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति को भीतर से रूपांतरित करे और समाज को अधिक मानवीय बनाए।

आपका जीवन आत्मबोध, आत्मशोधन, संयम, साधना, सेवा और लोकमंगल की अखंड साधना का जीवन्त उदाहरण है। श्रद्धा, समर्पण और साधना के साथ आपके कार्यों का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरक बना रहेगा।

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