संघ व समाज-सेवा में सतत समर्पित एक श्रेष्ठ संस्था
श्री ऑल इंडिया श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस समाज-सेवा और जन-कल्याण में समर्पित एक आदर्श संस्था है। अपने स्थापना-काल से ही यह संस्था सामाजिक समरसता, संघीय एकता, चतुर्विध संघ की सेवा, सामाजिक व धार्मिक मूल्यों के उन्नयन में समर्पित रही है। शिक्षा, चिकित्सा के साथ-साथ साधु-साध्वियों की सेवा और शुद्ध निर्ग्रन्थ-धर्म प्रचार-प्रसार में इस संस्था ने अनेक अविस्मरणीय अनुष्ठानों को सम्पादित किया है।
श्री ऑल इंडिया श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस मूलतः श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ की मातृ संस्था है। 120 वर्ष पूर्व सन् 1906 में अनेकों खण्डों में विभाजित स्थानकवासी समाज को एक सूत्र में संगठित करने के उद्देश्य से गुजरात के मौरवी शहर में इस संस्था की स्थापना हुई। तत्कालीन गौरवी राज्य के महाराज सर वागजी बहादुर के संरक्षकत्व तथा सेठ श्री चन्दनमलजी रियां वाले (अजमेर) की अध्यक्षता में आयोजित उस श्रावक-संगोष्ठी में भारत के विभिन्न अंचलों के अनेक गणमान्य श्रावक सम्मिलित हुए। संगठन, सद्भाव और सर्वोदय के संकल्प से नवगठित जैन कॉन्फ्रेंस के ध्वज के नीचे एकत्रित हो श्रावक-समुदाय ने जैन एकता का बिगुल बजाया। हाथ से हाथ और कदम से कदम जुड़ते गए। स्वल्प काल अवधि में ही जैन कॉन्फ्रेंस ने जैन एकता का एक महान आंदोलन खड़ा कर दिया। राष्ट्रीय फलक पर जैन कॉन्फ्रेंस चर्चित हुई।
कॉन्फ्रेंस का स्वरूप, आवश्यकता एवं स्थापना
कॉन्फ्रेंस अर्थात् महासभा, परिषद्, महामंडल अथवा समाज है। धार्मिक या व्यावहारिक विषयों का निर्णय करने के लिए प्राचीन समय से संघ या जाति के आगेवान एक साथ मिलने की प्रथा चली आ रहीं है। वर्तमान समय में ब्रिटिश साम्राज्य ने हम लोगों को नए तरीके से और नए नियमों से एकत्र किए और पारस्परिक विचार-विनिमय कर कार्य करने का शिक्षण दिया है। कॉन्फ्रेंस को सभी संघों का संयुक्त रूप-महासंघ कहें तो भी उसमें अत्युक्ति नहीं है। क्योंकि संघ जब एकत्र होता है तब उसमें अमुक देश या प्रदेश के लोग ही एकत्र होते हैं, जबकि "कॉन्फ्रेंस" जैसे महासंघ में तो भारत के समस्त प्रदेशों के अग्रगण्य जैनों को आमंत्रित किया जाता है और सभी के विचार सुनकर सबकी सम्मति से समाजोत्कर्ष के निर्णय किए जाते हैं। स्थानकवासी जैनों की भी भारतीय जनता में अच्छी प्रतिष्ठा है और भारत के प्रत्येक हिस्से में बसे हुए हैं। पृथक-पृथक प्रान्तों में बिखरे हुए समुदाय के आगेवानों ने एकत्र होकर समाज की उन्नति के लिए विचार करने की आवश्यकता की दृष्टि में रखते हुए मोरवी के जैन श्रीसंघ ने समग्र स्थानकवासी जैनों की एक "महासभा” बुलाने का निश्चय किया और विशेष हर्ष का विषय था कि कॉन्फ्रेंस करने के संबंध में समस्त खर्च वहन करने का उत्तरदायित्व मोरवी के एक सद्गृहस्थ सेठ श्री अम्बावीदास डोसाणी ने उठाया और इस तरह कॉन्फ्रेंस का शिलारोपण करने का और उसके जन्मदाता के गौरव पद धारण करने का सौभाग्य एवं सम्मान प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त मोरखी के महाराजा ठाकुर साहब ने इस कॉन्फ्रेंस के पेट्रन, "संरक्षक” बनकर कॉन्फ्रेंस की सार्थकता एवं सफलता पर चार चांद लगाया।
समाजोत्थान में कॉन्फ्रेंस की भूमिका
यह कॉन्फ्रेंस हमारी और हमारे समाज की समुन्नति चाहने वाली और करने वाली माता है। यह कॉन्फ्रेंस हमारे धर्म के प्रभाव को चारों ओर प्रसारित करने वाली दिव्य दुंदुभी नाद है। इस कॉन्फ्रेंस में प्रत्येक प्रान्त के नागरिक मिलकर अपने प्रतिनिधि चुनकर भेजते हैं और वे प्रतिनिधि अपने प्रान्त के सघों की समस्या प्रस्तुत करते हैं। ऐसी कॉन्फ्रेंस महासभा के करने से ऐसे सामाजिक एवं धार्मिक लाभ होते हैं, जो कल्पनातीत हैं। कॉन्फ्रेंस में समाज एवं धर्म उन्नति, प्रगति के विषयों की ही चर्चा वार्ता की जाए और प्रस्तावों को युक्तिपूर्वक कार्य रूप में परिणत किया जाए तो व्यावहारिक, सामाजिक एवं धार्मिक उत्थान होने की पूरी-पूरी संभावना रहती है। कॉन्फ्रेंस के माध्यम से हमारे श्रीसंघों में स्नेह और संघ की वृद्धि और पारस्परिक सहयोग से संघोत्थान के कार्य में सब श्रीसंघ जुट जाएं तो जैन धर्म के विजय ध्वज को हम चतुर्दिक फहरा सकेंगे। काठियावाड़ी, कच्छी, गुजराती, मारवाड़ी, मेवाड़ी, पंजाबी, दक्षिणी और बंगाली, बिहारी सभी जैन कॉन्फ्रेंस के एकछत्र के नीचे एकत्र होकर श्रीसंघों में पारस्परिक स्नेह और संघ की कैसे वृद्धि हो, इसका विचार करते हैं। कॉन्फ्रेंस में भिन्न-भिन्न प्रान्तों में रहने वाले स्वधर्मी बंधुओं का परिचय होता है और स्वधर्मी वात्सल्य का अपूर्व लाभ प्राप्त होता है। साथ ही भिन्न-भिन्न प्रदेश के विद्वान, श्रीमान्, गुणवान बंधुओं का परिचय होने से उनकी विद्वता, सहृदयता एवं बंधुता का पारस्परिक लाभ होता है। और उनकी छिपी हुई शक्ति प्रकाश में आती है और आपको अपनी शक्ति का भी परिचय देने का अवसर मिलता है।
प्रतिनिधियों की भूमिका और विचार प्रक्रिया
पैसा, परिश्रम और समय का योगदान देकर भिन्न-भिन्न स्थानों से पधारने वाले प्रतिनिधियों में से जिनकी इच्छा होगी और जिन्हें सब्जेक्ट कमेटी उस काम के लिए योग्य समझकर पसंद करेगी, ऐसे प्रतिनिधि समाज एवं धर्म की उन्नति प्रगति के विषय में भाषण द्वारा अपने समाजोपयोगी विचार प्रकट करते हैं। हमें व्यावहारिक, सामाजिक एवं धार्मिक विषयों पर चर्चा, वार्ता करने की आवश्यकता है। विद्वानों ने एकमत होकर एक निश्चय प्रकट किया है कि धार्मिक उन्नति के बिना व्यावहारिक, सामाजिक उन्नति और व्यावहारिक, सामाजिक उन्नति के बिना धार्मिक उन्नति प्रगति होना असंभव है। हमारे स्थानकवासी जैन समाज की प्रथम राष्ट्रीय संस्था जैन कॉन्फ्रेंस है। अतः उसमें चर्चनीय विषयों का दीर्घ दृष्टि से चयन करते है। इस कॉन्फ्रेंस में संघोत्थान एवं धर्मोत्थान के जरूरी विषयों की ही चर्चा, विचारण करते है। समस्त जैन संस्थाओं में नए पाठ्यक्रम द्वारा धर्म शिक्षण देना और धर्म परीक्षा द्वारा धर्म, ज्ञान का समुचित प्रचार करना और योग्य धर्म शिक्षक तैयार करने के लिए उपदेशक वर्ग की स्थापना करना। इसके लिए ज्ञान प्रकाश योजना का गठन किया गया है।
समाज सेवा, कल्याणकारी योजनाएँ एवं जीव दया कार्य
दुःखी और निराधार जैनों की योग्य सहायता करने के लिए अनाथ बालक, गरीब विधवाएं, अपंग श्रावक और निराश्रित विद्यार्थियों को योग्य सहायता पहुंचाना और उद्योगशालाएं स्थापित कर उन्हें काम धन्धे पर लगाना। इसके लिए जीवन प्रकाश योजना का गठन किया गया है। तदुपरांत जहां-जहां जीव हिंसा होती हो, वहां हिंसा विरोध उपायों को कामयाब बनाना। इसके लिए जीव दया योजना का गठन किया गया है। इसके अतिरिक्त दूसरे अनेक ऐसे विषय है जिन पर गंभीरतापूर्वक चर्चा विचारण करके समाज एवं धर्म के क्षेत्र में सुधार करते है। समाज के ऐसे वर्ग जो जीवनयापन करने में असमर्थ है उनकी सेवा करते है। इसके लिए मानव सेवा योजना की स्थापना की गई। साधु-संतों के विहार, आहार, बीमार अवस्था आदि के लिए वैय्यावच्च समिति का गठन किया गया है।