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Shri All India Swetamber Sthanakwasi Jain Conference

Introduction

श्रमण संघ अतीत से आज तक

श्रमणसंघ, अरिहंत परमात्मा की महान कृपा से जिनशासन की प्रभावना हेतु स्थापित किया जाता है। प्रत्येक तीर्थंकर केवल ज्ञान के होने के पश्चात् तीर्थ की स्थापना करते हैं, जिसमें साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका रूप चार तीर्थ होते हैं। चारों ही तीर्थ आत्मबोध के पश्चात् आत्मा से परमात्मा बनने हेतु पुरुषार्थ करते हैं। स्वयं तिरते हैं और दूसरों को तिराने के निमित्त बनते हैं। चतुर्विध संघ के प्रमुख आचार्य कहलाते हैं।

स्थानकवासी सम्प्रदाय संगठन क्यों?

भगवान महावीर के शासन में आर्य सुधर्मा स्वामी प्रथम पट्टधर बने। उनके 60 पट्टधर देवलोक पधारने तक श्रमणसंघ में अनेक धाराएँ प्रवाहित होने लगीं, आत्म धर्म गौण होने लगा। व्यक्तिवाद व क्रियाकाण्ड प्रमुख होने लगे। अनेक छोटे-छोटे सम्प्रदाय बन गए। उनकी समाचारियों पर देश-काल परिस्थितियों का अधिक प्रभाव पड़ने लगा।

ऐसी स्थिति में तत्कालीन आचार्यों एवं श्रावकों ने चिन्तन किया कि जिनशासन में एकरूपता और आपसी प्रेम बढ़ाने हेतु समग्र स्थानकवासी जैन सम्प्रदाय का एक संगठन बने। इस प्रकार श्रमणसंघ का पुनर्गठन सम्पन्न हुआ।

श्रमणसंघ का उदय

'एक आचार्य, एक समाचारी' सिद्धांत के आधार पर सन् 1952 में अक्षय तृतीया के दिन सादड़ी में श्रमणसंघ की स्थापना की गई। इसका नाम 'श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमणसंघ' रखा गया।

संघ में रहने वाले साधु-साध्वियों के लिए निम्न व्यवहार निश्चित किए गए:

  • आपस में उपकरणों का लेन-देन
  • शास्त्रों की वांचना
  • आहार-पानी, औषध-भेषज का सहयोग
  • मिलने पर एक-दूसरे का सम्मानपूर्वक अभिवादन
  • परस्पर निमंत्रण देना
  • संतों के आगमन पर खड़े होकर स्वागत करना
  • विधिवत वंदन करना
  • सेवा के लिए तत्पर रहना
  • एक ही स्थानक में साथ ठहरना
  • एक आसन पर बैठकर धर्म कथा का आयोजन

इन व्यवस्थाओं के कारण पूरे देश में श्रमणसंघीय साधु-साध्वी एक समाचारी और एक आचार्य के अधीन संगठित हुए, जिससे अनुशासन और व्यवस्था मजबूत हुई।

श्रमणसंघ का अतीत और आचार्यों का योगदान

भगवान महावीर के 91 पट्टधर और श्रमणसंघ के प्रथम पट्टधर आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्माराम जी म. बने। उनके शासनकाल में श्रमणसंघ की जड़ें मजबूत हुईं।

द्वितीय पट्टधर आचार्य पूज्य श्री आनन्दऋषि जी म. ने संघ के तने को सुदृढ़ बनाया। तृतीय पट्टधर आचार्य पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म. ने इस वृक्ष को पोषित किया और आज यह फल देने की अवस्था में पहुँच चुका है।

श्रमणसंघ का वर्तमान

आज हमारा दायित्व है कि हम अनुशासन में रहते हुए समर्पण भाव से संघ की सेवा करें। प्रत्येक साधु-साध्वी को अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए मैत्री, सहयोग और प्रेमभाव को बढ़ाना चाहिए।

संघ-समाज में बढ़ते तनाव, चिन्ता और व्यक्तिवाद को त्यागकर शिक्षा, सेवा, साधना और संगठन को महत्व देने से जिनशासन की प्रभावना बढ़ेगी।

74 वर्षों की यात्रा: श्रमणसंघ ने एक यशस्वी यात्रा तय की है। अनेक महापुरुषों ने अपना जीवन समर्पित कर इस संगठन को सशक्त बनाया है।

सभी पदाधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाएं और अपने पद की गरिमा बनाए रखें। साधु जब अपनी साधना के साथ जिनशासन की सेवा करता है, तब पद स्वयं उसके पास आते हैं। परन्तु यदि वह केवल व्यक्तित्व-पूजा में लग जाता है, तो वह कर्म बन्ध का कारण बनता है।

श्रमणसंघ का संगठन आचार्य, उपाध्याय, प्रवर्तक आदि पदों द्वारा व्यवस्थित रूप से संचालित होता है। वर्तमान में हमारा कर्तव्य है कि हम श्रमणसंघ के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु पूर्ण पुरुषार्थ करें।

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