वर्तमान शताब्दी का दिशादर्शक पूना श्रमण सम्मेलन (१९८७)
महाराष्ट्र की पूना नगरी में अ० भा० श्वे० स्था० श्रमण संघ का अधिवेशन दिनांक ३० अप्रैल से १३ मई तक चला, जिसमें १२ एवं १३ मई को खुला अधिवेशन था। लगभग तीन सौ साधु-साध्वियों ने श्रमण संघ के आचार्य श्री आनन्दऋषि जी म० के सान्निध्य में कई दिनों तक लगातार चिंतन-मनन कर श्रमण संघ को सुदृढ़ करने के लिए निर्णय लिये। साधुओं की समाचारी, श्रमण संघ के संगठन एवं समाज को नई दिशा तथा प्रेरणा देने वाले अनेक निर्णय सर्वसम्मति से हुए। इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी— उपाचार्य एवं युवाचार्य पद की आचार्यश्री द्वारा घोषणा एवं सम्पूर्ण संघ द्वारा सहर्ष उसकी स्वीकृति।
सादड़ी-सम्मेलन के लगभग ३५ वर्षों बाद श्रमण संघ का यह विशाल अधिवेशन पूना में हुआ। ३० अप्रैल को लगभग चालीस हजार नर-नारियों, साधु-साध्वियों का भव्य जुलूस निकला एवं स्वागत समारोह हुआ। देश भर से लम्बी-लम्बी पदयात्रा करते हुए पूज्य साधु-साध्वी वृन्द पूना पधारे। पूना के मुकुन्द नगर में सन्त-सतियों के विराजने से लेकर कार्यक्रम पंडाल, भोजनशाला आदि की सारी व्यवस्थाएँ की गईं। स्वागत समिति के अध्यक्ष श्री बंकट लाल कोठारी एवं उनके साथियों ने अत्यन्त परिश्रम एवं सूझ-बूझ से इस अधिवेशन को सर्वांगीण सफल बनाया। खुले अधिवेशन में लगभग एक लाख लोगों की विशाल उपस्थिति थी। महाराष्ट्र के राज्यपाल एवं पूज्य शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद जी भी खुले अधिवेशन में सम्मिलित हुए।
इतनी विशाल उपस्थिति के लिए भव्य पंडाल, भोजन की निःशुल्क व्यवस्था, आवास-व्यवस्था तथा अन्य छोटी-बड़ी व्यवस्थाएँ अत्यन्त सुन्दर थीं। इतनी विशाल उपस्थिति में श्रावक-श्राविका वर्ग जिस उत्साह और आशा से एकत्र हुआ था, उनकी वह आशा फलीभूत हुई। आम श्रद्धालुओं को साधु-समाचारी में उतनी दिलचस्पी नहीं थी, जितनी युवाचार्य एवं उपाचार्य पद की घोषणा सुनने का आकर्षण था।
दिनांक १२ मई को खुले अधिवेशन में पूज्य आचार्य श्री आनन्दऋषि जी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में उपाचार्य पद सुप्रसिद्ध विद्वान् सन्त श्री देवेन्द्रमुनि शास्त्री को एवं युवाचार्य पद के लिए युवा विद्वान् सन्त डॉ. श्री शिवमुनि को घोषित किया। दूसरे दिन १३ मई को खुले अधिवेशन में आचार्य श्री ने दोनों को चादर ओढ़ाई एवं दायित्व सौंपा। इसके साथ ही श्री सौभाग्य मुनि ‘कुमुद’ को महामंत्री तथा श्री सुमनमुनिजी एवं श्री प्रवीण ऋषिजी को मन्त्री पद पर नियुक्त किया गया।
आचार्य श्री की घोषणा को पूरे संघ ने सहर्ष स्वीकार किया एवं जय-जयकार से वातावरण गूँज उठा। श्रमण संघ की एकता, अनुशासन और संगठन का वह अद्भुत दृश्य था। देश भर का जैन समाज बड़ी उत्सुकता से साधु-सम्मेलन के निर्णयों और गतिविधियों को देख रहा था। स्थानकवासी जैन समाज को इस सम्मेलन से एकता और संगठन की दिशा मिली। वहाँ उपस्थित सभी साधु-साध्वी प्रसन्न थे, और श्रावक-श्राविकाओं में अपूर्व उत्साह था। लगता था मानो एक बड़ी उपलब्धि हुई है— और यह सत्य भी था।
इस अधिवेशन में लिये गये निर्णयों में से कुछ तो ऐसे थे जो पूरे जैन समाज को स्पर्श करते हैं। अतः उन निर्णयों पर पूरे जैन समाज को चिंतन करना चाहिए। पूना के तीनों स्थानकवासी श्रीसंघों ने सम्मिलित रूप से स्वागत समिति गठित कर जिस बड़े पैमाने पर एकता के साथ तन-मन-धन से अधिवेशन को सफल बनाया, उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। अ० भा० स्था० जैन कॉन्फ्रेंस, दिल्ली के पदाधिकारीगण महीनों से इस कार्य में उन्हें सतत मार्गदर्शन और सहयोग दे रहे थे तथा सारे कार्यक्रमों को व्यवस्थित कर रहे थे। सबका सम्मिलित प्रयास, पूज्य आचार्य श्री की कृपा एवं त्यागी विद्वान् साधु-साध्वी वर्ग का परिश्रम सफल हुआ।
सम्मेलन में सर्वानुमति से पारित प्रस्ताव एवं व्यवस्थाएँ
२ मई १९८७ से अखिल भारतवर्षीय स्थानकवासी जैन श्रमण संघ का सम्मेलन प्रारम्भ हुआ, जिसमें भारत भर से आचार्य सम्राट् १००८ पूज्य श्री आनन्द ऋषिजी म० की आज्ञा में विचरण करने वाले ३०० साधु-साध्वीजी पधारे। इनमें अनेक उपाध्याय, प्रवर्त्तक, सलाहकार आदि पदाधिकारी मुनिराज भी सम्मिलित थे। १० दिनों तक आचार्यदेव के पावन सान्निध्य में साधु-समाचारी व समाज के चहुँमुखी विकास के लिये अनेक प्रकार के नियम-उपनियम बनाये गये। अन्ततः १२ मई को खुला अधिवेशन रखा गया, जिसमें देश भर से श्रमण संघ के अनुयायी श्रावक-श्राविका गण लगभग एक लाख की संख्या में विशेष उत्साह से एकत्रित हुए। देश के हजारों नेता व कार्यकर्ता भारी संख्या में पधारे और यह अधिवेशन सानन्द सम्पन्न हुआ।
इस पावन अवसर पर सर्वानुमति से चुने गए उपाचार्य एवं युवाचार्य की घोषणा करते हुए आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनन्दऋषि जी महाराज ने श्रद्धेय शास्त्री श्री देवेन्द्रमुनि को भावी आचार्य के रूप में उपाचार्य पद प्रदान किया तथा श्रद्धेय डॉ. शिवमुनि जी महाराज को युवाचार्य पद प्रदान किया। इस मंगल घोषणा को श्रवण कर आकाश जयघोषों से गुंजित हो उठा। लाखों आँखें हर्ष से परिपूर्ण हो उठीं। १३ मई को पुनः आचार्यदेव ने चादर अर्पित करते हुए अपना आशीर्वाद प्रदान किया।
इस सम्मेलन में प्रवर्तक श्री रूपचन्दजी महाराज, सलाहकार श्री सुमनमुनि जी म., सचिव श्री सौभाग्यमुनि जी म. जिन्हें अब श्रमण संघीय महामंत्री बनाया गया, आदि पदाधिकारी मुनिराजों का विशेष श्रम रहा। उपाध्याय श्री पुष्करमुनि जी महाराज, उपाध्याय श्री केवलमुनि जी महाराज, उपाध्याय श्री विशालमुनि जी महाराज, प्रवर्तक श्री रमेशमुनि जी, प्रवर्तक श्री कल्याणऋषि जी महाराज, प्रवर्तक श्री उमेशमुनि जी, श्री विजयमुनि जी आदि का मंगल आशीर्वाद बना रहा।
महत्वपूर्ण प्रस्ताव
- राष्ट्रीय एकता-अखण्डता का समर्थन
- पंजाब-समस्या का अहिंसात्मक ढंग से समाधान
- सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान
- मांसाहार और मद्यपान का निषेध
- मांसाहार-अण्डाहार का विरोध
- दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश
- कत्लखाने बन्द हों
- संवत्सरिक एकता का सुझाव
- साधु-साध्वी द्वारा वाहन-विहार का विरोध
- स्थानकों में श्रमण-श्रमणी के फोटो नहीं लगाने के विषय में
श्रमणसंघीय मान्यताप्राप्त प्रतिनिधि प्रार्थना / महावीर-वंदना
लय — “यदि भला किसी का...” / “उठ भोर भई टुक जाग...”
श्रद्धा सुमनाञ्जलि अर्पित हो, महावीर प्रभु के चरणों में।
तन-मन-जीवन आनन्दित हो, महावीर प्रभु के चरणों में।।
हो वीतराग का भाव-स्पर्श, परिवर्तित हो जीवन सारा।
कथनी-करनी का साम्य-योग, रच पाए जीवन की धारा।।
मोह मेरुदण्ड अब खण्डित हो, महावीर प्रभु के चरणों में।।
जीवन की वीणा पर करूणा की, मधुर झंकार चले।
मानव-मानव में भेद नहीं, पग-पग समता के कुसुम खिलें।
जीवन सारा सत्यान्वित हो, महावीर प्रभु के चरणों में।।
अपने पर अपना अनुशासन, यह संयम की सच्ची भाषा।
यह राष्ट्र-विश्व मंगलमय हो, सेवा की सुन्दर परिभाषा।
संयम-सेवा प्रवृर्तित हो, महावीर प्रभु के चरणों में।।
जिन शासन यह मंगलमय है, यह श्रमण संघ मंगलमय है।
मंगलमय आगम सूत्र अर्थ, जिन पथ साधन मंगलमय है।
अमंगल सब कुछ वर्जित हो, महावीर प्रभु के चरणों में।।
आचार्य प्रवर, उपाचार्य प्रवर, उवज्झाय, प्रवर्त्तक, अनुशास्ता।
शासन शास्ता के प्रति रहे, दृढ़ प्रीतिपूर्ण सच्ची आस्था।
“मुनि कुमुद” संघ संवर्धित हो, महावीर प्रभु के चरणों में।।
संसूचन: जहाँ “उपाचार्य प्रवर” है, वहाँ दुबारा बोलते समय “युवाचार्य प्रवर” भी बोला जाए। इस तरह दोनों महापुरुषों के प्रति श्रद्धार्पण हो जाएगा।