प्रथम साधु-सम्मेलन अजमेर : समन्वय का शुभारम्भ

आज से लगभग 93 वर्ष पहले, अमृत क्षण का अवतरण चैत्र सुदि 10 को दिन में 2:30 बजे, आकाश में चमकते प्रचंड सूर्य की तरह हुआ।

मंगलवार के मंगलमय दिन से प्रारम्भ होकर यह साधु सम्मेलन पूरे पन्द्रह दिन लगातार सामाजिक संगठन, संघ के चिन्तन, संगठन की सुदृढ़ता, समाज की आशा, आध्यात्मिक त्यागी वर्ग में सम्प्रदाय-मुक्त एकता, वैचारिक मतभेदों की समाप्ति, आदर्शों की स्थापना तथा जैन कॉन्फ्रेंस एवं समस्त संघ-प्रेमियों के प्रयासों की सफल सम्पूर्ति के साथ इस शताब्दी में प्रथम बार सम्पन्न हुआ। यह ऐतिहासिक सत्य है कि इस असंभव कार्य को संभव बनाने में जैन कॉन्फ्रेंस के प्रतिबद्ध समाजसेवियों ने अहर्निश प्रयास किए। सम्मेलन का स्थान अजमेर नगर का मशहूर लाखन कोटड़ी मुहल्ला रहा, जहाँ उन दिनों ममैयो के नौहरे का प्रमुख स्थान था। इसी नौहरे में संतों-साध्वियों की चौपाल जमी थी।

भवन के बीचों-बीच एक विशालकाय वटवृक्ष था। उसके नीचे ही मंडलाकार बैठकर पुरोधा संत-प्रतिनिधियों ने खुली चर्चा में भाग लिया था। प्रमुख नौहरे के भीतर संतों के बीच किसी भी व्यक्ति या सामाजिक शक्ति को पहुँचने का अधिकार नहीं था। यह इस सम्मेलन की खास विशेषता थी। इसकी एक और विशेषता यह थी कि जैन कॉन्फ्रेंस एवं समाज ने आयोजन की रूपरेखा और व्यवस्था तो की, किन्तु किसी भी तरह की शर्त या कोई गुप्त एजेंडा नहीं रखा था। मुक्त विचार-विमर्श ही साधु-सम्मेलन का आधार था।

सम्मेलन की प्रमुख विशेषताएँ

इस प्रथम साधु-सम्मेलन में 238 मुनिराज एवं 80 साध्वीजी म. के साथ 76 अन्य मुनिराज प्रतिनिधि के रूप में सादर सम्मिलित हुए। स्मरण रहे कि उस समय समस्त भारत में स्थानकवासी साधु 463 और साध्वियाँ 1132 थीं।

इनमें पू. श्री अमरसिंह जी म. की सम्प्रदाय, पूज्य श्री स्वामीदास जी म. की सम्प्रदाय, पूज्य श्री नानकराम जी म. की सम्प्रदाय, पूज्य श्री रघुनाथ जी म. की सम्प्रदाय, पूज्य श्री जयमल जी म. की सम्प्रदाय, पूज्य श्री चौथमल जी म. की सम्प्रदाय, श्री खंभात सम्प्रदाय, पूज्य श्री धर्मसिंह जी म. की सम्प्रदाय, पूज्य उत्तमचंद जी म. एवं श्री ज्ञानचंद्र जी म. की सम्प्रदाय, महाराष्ट्र और मालवा में प्रभावी ऋषि सम्प्रदाय, कच्छ की मोटी सम्प्रदाय, लींबड़ी की छोटी सम्प्रदाय, बोटाद और लींबड़ी सम्प्रदाय, कोटा सम्प्रदाय, श्री एकलिंगदास जी म. की सम्प्रदाय तथा पूज्य श्री मोतीराम जी म. एवं पूज्य श्री अमरसिंह जी म. की (पंजाबी) सम्प्रदाय ने भागीदारी की। प्रत्येक सम्प्रदाय से संख्यानुसार प्रतिनिधि लिये गये।

इस सम्मेलन में युवाचार्य श्री काशीराम जी म., गणि श्री उदयचंद्र जी म., उपाध्याय श्री आत्माराम जी म., व्याख्यान-वाचस्पति श्री मदनलाल जी म., योगीराज श्री रामजीलाल जी म., आगम-विशारद पूज्य श्री अमोलक ऋषि जी म., श्री आनंद ऋषि जी म., श्री छगनलाल जी म., श्री हस्तीमल जी म., श्री पुरुषोत्तम जी म., श्री हर्षचन्द्र म., शतावधानी श्री रत्नचन्द्र जी म., श्री नानकचन्द जी म., श्री नागचन्द्र जी म., देवचंद्र जी म., श्री पृथ्वीचंद्र जी म., श्री हजारीमल जी, श्री मिश्रीमल जी ‘मधुकर’, श्री शार्दुलसिंह जी, श्री दयालुचंद्र जी, श्री पन्नालाल जी म., श्री फतेहचंद्र जी, श्री फूलचंद्र जी, धर्मदास सम्प्रदाय के श्री ताराचंद जी म., मालव केसरी श्री सौभाग्यमल जी, श्री समरथमल जी म., श्री गोकुलचंद जी म., श्री धनसुख जी, श्री पुरुषोत्तम जी, श्री शिवलाल जी म. तथा श्री मोहनलाल जी जैसे सम्माननीय एवं प्रभावी संत-रत्न उपस्थित थे।

किन्तु जिन संतों के ऊपर आयोजन को सफल बनाने का भार विशेष रूप से था, उनमें जैन दिवाकर पूज्य श्री चौथमल जी, पू. श्री पन्नालाल जी म., युवाचार्य श्री कांशीराम जी म., पू. श्री आनंद ऋषि जी म., श्री किशनलाल जी म., श्री सौभाग्यमल जी म., श्री लक्ष्मीचंद जी म., श्री छगनलाल जी म. तथा श्री मिश्रीमल जी म. ‘मरुधर केसरी’ प्रमुख थे। इन महामुनियों ने श्रावक-श्राविकाओं को तो एकता के सूत्र में बाँधा ही, साथ ही मूर्धन्य मुनि-मंडल को भी एक स्थान पर लाने में बड़ा योगदान दिया।

इस ठोस पहल की भूमिका बनाने में मरुभूमि के 6 संत-संघाड़ों ने एकजुट होकर बड़ा भारी काम किया था। पूज्य श्री नानकचंद्र जी की समुदाय, पू. श्री रघुनाथ जी म. की समुदाय, पू. श्री जयमल जी म. की समुदाय, पू. श्री अमरसिंह जी म. की मेवाड़ी सम्प्रदाय एवं पूज्य श्री चौथमल जी म. की सम्प्रदाय में मतभेद हो चले थे। जनता में उत्साह इतना था कि वरिष्ठ संतों के आगमन की सूचना मात्र से उपस्थित विशाल समुदाय में हर्ष की हिलोरें उठने लगती थीं। सब एक-दूसरे को प्रेम से निहारते, परिचय पाने को उतावले लग रहे थे। क्योंकि यह दृश्य कल्पनातीत था। अनेक लोगों के जीवन में यह मुनि-सम्मेलन पहला अनुभव था। सभी चाहते थे कि यह साधु-सम्मेलन सफल हो। मुनि-मंडल की, महासती-मंडल की जय-विजय हो। श्रावक-श्राविका रूप गृहस्थों का हर्ष बार-बार गूँज रहा था। इन हजारों आशाओं, सहस्त्रों प्रार्थनाओं, असंख्य स्तुतियों, अनेक सद्भावनाओं और सम्भावनाओं ने ऐतिहासिक नगरी अजयमेरु को अजरामर धर्मनगरी बना दिया था।

प्रथम साधु-सम्मेलन में पंजाब एवं उत्तर भारत का योगदान

जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है, उस समय समस्त भारत में स्थानकवासी परम्परा से जुड़े लगभग 1565 संत-साध्वीजी धर्म-प्रवर्तनरत थे। इनमें से पंजाब परम्परा से जुड़े 73 मुनिराज एवं 60 महासतियाँ थीं। इनमें से 25 मुनि पंजाब से 450 मील पैदल चलकर सम्मेलन में पधारे थे। इन मुनियों में निम्नलिखित पाँच निर्वाचित प्रतिनिधि थे:

  1. गणी श्री उदयचन्द जी महाराज (नेतृत्वकर्ता)
  2. उपाध्याय श्री आत्माराम जी महाराज
  3. युवाचार्य श्री काशीराम जी महाराज
  4. व्याख्यान-वाचस्पति श्री मदनलाल जी महाराज
  5. योगीराज श्री रामजीलाल जी महाराज

उपरोक्त 76 प्रतिनिधि समान आसनों पर गोलाकार में बैठे। उनके बीच में हिन्दी तथा गुजराती लिखने वाले मुनि बैठे थे। सम्मेलन में छब्बीसों सम्प्रदाय के प्रतिनिधि जैन धर्म के गौरव का कायाकल्प करने के लिए एकत्रित हुए थे।

मंगलाचरण के पश्चात् गणी श्री उदयचन्द जी महाराज को सर्वसम्मति से इस सम्मेलन का शान्तिरक्षक चुना गया। उनके अतिरिक्त शतावधानी मुनि श्री रत्नचन्द जी महाराज को भी उनके साथ चुना गया, किन्तु गणी जी के रोगग्रस्त होने से समस्त कार्यवाही श्री शतावधानी जी म. ने ही चलाई। इस सभा की हिन्दी कार्यवाही लिखने का कार्य उपाध्याय श्री आत्माराम जी महाराज को तथा गुजराती कार्यवाही का भार लघु शतावधानी मुनि श्री सौभाग्यचन्द जी महाराज को दिया गया। उनकी सहायता के लिए मुनि श्री मदनलाल जी महाराज तथा मुनि श्री विनयऋषि जी महाराज को नियत किया गया था।

आरम्भ में कार्यवाहक शांतिरक्षक शतावधानी मुनि श्री रत्नचन्द जी महाराज ने मंगलाचरण किया। फिर सम्मेलन के कार्य को सुगम बनाने के लिए 21 मुनिवरों की एक विषय-निर्वाचिनी समिति बनाई गई। इसका कोरम 11 का रखा गया। विषय समिति की बैठक रात्रि में की जाती थी। सम्मेलन में निम्नलिखित निश्चय किये गये:

समिति सम्बन्धी निर्णय

भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों की समान समाचारी का प्रवर्तन एक सूत्र में ग्रंथित करने तथा सम्मेलन के प्रस्तावों को कार्यरूप में परिणत करने के लिए विभिन्न सम्प्रदायों के प्रतिनिधि 27 मुनियों की एक समिति बनाई गई। इसमें पूज्य आचार्य श्री सोहनलाल जी महाराज के चार पंजाबी प्रतिनिधि रखे गये थे: युवाचार्य श्री काशीराम जी महाराज, गणी उदयचंद जी महाराज, उपाध्याय आत्माराम जी महाराज और मुनि श्री मदनलाल जी महाराज। इस मुनि समिति के प्रान्तवार पाँच मंत्री चुने गये — काठियावाड़ के मंत्री मुनि श्री हस्तीमल जी महाराज, पंजाब के मंत्री उपाध्याय आत्माराम जी महाराज, मारवाड़ के मंत्री मुनि श्री छगनलाल जी महाराज, दक्षिण के मंत्री पंडित मुनि श्री आनन्द ऋषि जी महाराज तथा मेवाड़ के मंत्री मुनि श्री हस्तीमल जी महाराज।

इस समिति के कार्य के लिए विस्तृत नियम भी बनाए गए। इसके अतिरिक्त एक ज्ञान-प्रचारक मंडल की स्थापना भी पृथक-पृथक क्षेत्रों के लिए की गई, जिसके नियम भी विस्तारपूर्वक तैयार किए गए थे।

पूज्य संतों ने सामाजिक भावनाओं को सफलीभूत बनाने का निश्चय कर लिया था। यही कारण है कि यह विलक्षण कार्य कविमना श्री नानकचंद्र जी म. के मंगलाचरण “किंकर्पूरमयं” स्तोत्र की गूँज के पश्चात् शतावधानी मुनि श्री रत्नचन्द्र जी म. के इस श्लोक-पाठ में साकार हो गया:

लक्ष्यं मेरुगिरिः समुन्नततरं, गंभीरमब्धेर्मनो। वाणी प्रेम सुधाझरी हितकारी, दुष्टिर्दिगन्तं गता।।
येषां कष्ट सहं शरीरमनधं, श्रेयोविधो तत्परा-स्ते संतों हि विभूषयन्तु समितिं, गत्वाजमेरंपुरम् ।।

भावार्थ यह है कि लक्ष्य सुमेरु पर्वत से भी उच्च एवं उन्नत है, मन समुद्र से भी अधिक गंभीर है, वाणी प्रेम-निर्झर के समान माधुर्यवाली है, हितकारी दृष्टि दिग्दिगन्त को छू रही है। परिषह में तपकर काया कुंदन-सी पवित्र हो गई है। अपना और पराये का भेद समाप्त हो गया है। ऐसे कल्याणकारी वातावरण में सत्पुरुषों का यह आगमन अजमेर नगरी की शोभा बढ़ा रहा है।

स्वस्तिवाचन के पश्चात् ऋषि सम्प्रदाय के शीर्षमणि पूज्य श्री अमोलक ऋषि जी म. के अनमोल उद्गार श्रवणित हुए, जिनका अपूर्व प्रभाव प्रत्यक्ष देखा गया। पू. रत्नचन्द्र जी म. ने सम्मेलन की विषयवस्तु और लक्ष्य पर उपस्थित महापुरुषों का ध्यान खींचा।

जैन कॉन्फ्रेंस के ध्रुव समान समाजसेवी श्री दुर्लभजी भाई ने अपने सम्बोधन में निवेदित किया कि आज हमारे जीवन का महान अवसर हमारे सामने है। सौभाग्यवश हमें इतनी बड़ी संख्या में उच्चकोटि के महात्माओं, महासतियों और आचार्यों का पावन दर्शन एवं मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है। अतः हमें इन महापुरुषों के चर्चा-क्रम में व्यवधान नहीं बनना है। त्यागी वर्ग स्वयं सबके हिताहित का विचार करके निर्णय ले लेगा। हमारी ओर से कोई व्यवधान न हो; ऐसा अनुशासन बनाए रखकर हमें केवल सहयोगी बनना है।