सकारात्मक क्रांति और बदलाव की मशाल
जैन कॉन्फ्रेंस केवल एकत्र होकर विचार-विमर्श करने का मंच नहीं है, बल्कि यह एक परिवार की तरह पूरे जैन समाज को साथ लेकर आगे बढ़ने का सशक्त माध्यम है। इस संगठन का बीजारोपण सन् 1906 में मौरवी, गुजरात में हुआ था, और आज यह संस्था जैन समाज की एकता, प्रगतिशील सोच तथा संगठित शक्ति का प्रतीक बन चुकी है। यह मंच श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन धर्म परम्परा का एक प्रमुख और प्रतिनिधि स्वरूप प्रस्तुत करता है।
जैन कॉन्फ्रेंस क्या है? क्यों हैं?
यदि इसका अवलोकन करें तो स्पष्ट होता है कि गुजरात प्रदेश में एक महत्वपूर्ण क्रियोद्धारक प्रयोग हुआ। हमारी प्राचीन धर्म परम्परा, जो इतिहास के अभाव में अपनी पहचान खोने लगी थी, उसका पुनः उत्कर्ष हुआ। क्रांतदृष्टा, परम त्यागमूर्ति पूज्य आचार्य श्रीमद् धर्मदास जी म.सा., पूज्य श्री लवजी ऋषि जी म.सा. तथा पूज्य श्री जीवराज जी म.सा. के उज्ज्वल चरित्र, तप, त्याग, ज्ञान-ध्यान और शुद्ध भावना से प्रेरित होकर 99 महान आत्माओं ने इस प्रभावना को आगे बढ़ाने हेतु संत जीवन को अपनाया।
श्रमणेश्वर भगवान महावीर के विचार-दर्शन को आधार बनाकर, परंतु अपने पुरुषार्थ से इन 99 संतों को 27 टोलों में विभाजित किया गया, जिससे विभिन्न सम्प्रदायों एवं संघों का विकास हुआ। किंतु समय के साथ, मानवीय स्वभाव के कारण वैचारिक मतभेद उत्पन्न हुए और अहंकार के प्रभाव से ये मतभेद मनभेद में परिवर्तित हो गए।
विशेष रूप से पंजाब परम्परा में उत्पन्न ‘पत्री प्रकरण’ ने उग्र रूप ले लिया। जब श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य को विवादों में घिरा हुआ देखा, तो उन्होंने आगे बढ़कर विनयपूर्वक संवाद और समाधान का प्रयास किया। इसी प्रकार के प्रयासों और सामूहिक चिंतन के परिणामस्वरूप मौरवी में एक ऐसे संगठन की आवश्यकता अनुभव की गई, जो समाज को एक सूत्र में बाँध सके—और यही जैन कॉन्फ्रेंस के गठन का आधार बना।
जिन कार्यकर्ताओं, समाजसेवियों तथा राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर के सेवाभावी व्यक्तियों ने जैन कॉन्फ्रेंस के विकास में योगदान दिया है, वह इसकी सशक्त और प्रेरणादायी यात्रा का प्रमाण है।
वर्तमान में जैन कॉन्फ्रेंस
जैन भवन दिल्ली में जैन कॉन्फ्रेंस का केन्द्रीय कार्यालय है जो प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन करता है। जैन कॉन्फ्रेंस का स्पष्ट लक्ष्य है हमारे आराध्य पूज्य साधु-साध्वी जी म.सा. की संयम यात्रा में साता पहुंचाना। वहीं ज्ञान प्रकाश, जीवदया, मानव सेवा, जीवन प्रकाश, वैयावच्च समिति, विहारधाम, अल्पसंख्यक योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से सामाजिक विकास के कार्य करना प्रारंभ हुआ और जारी रहा।
जैन कॉन्फ्रेंस के सम्पूर्ण देश में लगभग 80 हजार सदस्य हैं।
जैन कॉन्फ्रेंस दान सेवा के स्वयंसेवी प्रकल्पों से संचालित होती है। इसका एक विधिवत विधान है, व्यवस्था की दृष्टि चुनाव या चयन होकर अध्यक्ष की, अध्यक्षता में एक प्रबंध और प्रतिनिधि सभा कार्यरत है। योजना के अध्यक्ष मंत्री, विश्वस्त मंडल महिला एवं युवा शाखा भी बनी हुई है। आज सम्पूर्ण देश में जैन कॉन्फ्रेंस की प्रांतीय शाखाएं और बड़ी संख्या में सदस्य सेवा कार्य कर रहे हैं।
सामाजिक जीवन में कार्य करने वाले अनुभवी समाजसेवी हमारी इस बात से सहमत होंगे कि कोई भी उपलब्धि सहज प्राप्त नहीं होती। यदि संयोग से प्राप्त हो भी जाए तो वो संतोष नहीं मिलता, जो मेहनत और संघर्ष के बाद जद्दोजहद के बाद मिलता है।
यह गौरव और सात्विक गर्व का विषय है कि श्री ऑल इंडिया श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस में लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं का प्रारंभ से वर्तमान तक पूरी निष्ठा और दृढ़ता से पालन किया गया है। पूरे देश को 5 ज़ोन एवं 14 प्रांतों में विभक्त करके प्रत्येक 2 वर्ष के अध्यक्षीय कार्यकाल द्वारा सभी को पारदर्शी रूप से क्षेत्रीय आधार पर प्रतिनिधित्व प्रदान किया जा रहा है। वर्तमान में इस संस्था के अस्सी हजार सक्रिय सदस्य है। प्रत्यक्ष रूप से 1400 श्रमण संघ के साधु-साध्वियों, सैकड़ों अन्य सम्प्रदायों के साधु-साध्वियों एवं सामूहिक रूप से लाखों श्रावक-श्राविकाओं का आशीर्वाद इस संस्था को प्राप्त है।