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Shri All India Swetamber Sthanakwasi Jain Conference

Jain Conference and Shraman Sangh

जैन कॉन्फ्रेंस और श्रमण संघ के ऐतिहासिक संबंध, एकता के प्रयास और मातृ संस्था के रूप में कॉन्फ्रेंस की भूमिका का विस्तार।

जैन कॉन्फ्रेंस व श्रमण संघ

परम् वीतरागीयों, देवाधिदेवों जिनेन्द्र भगवान द्वारा धर्म का सम्यक प्रकाश किया गया जो आत्मकल्याण हेतु आत्म पुरुषार्थ या स्व परिश्रम पर भरोसा करता है। अपनी मुक्ति अपने ही हाथ है क्योंकि बंधन भी हमारे अपने द्वारा ही बनाया हुआ है इसी केंद्रीय विचार पर श्रमण संस्कृति का विकास हुआ है जिसमें जैन धर्म भी है। समय बीतने के साथ जैन धर्म में अलग-अलग संम्प्रदायों का उदय हुआ जिनमें चार मुख्य संम्प्रदायों में स्थानकवासी सम्प्रदाय भी एक है।

स्थानकवासी धारा में भी काल प्रभाव से बहुत सी छोटी बड़ी धाराएं बनती चली गयी जो आपस में धर्म की हानि का कारण बन रही थीं। संम्प्रदायों की आपसी कटुता से चिंतित कुछ श्रावकों ने इसके समाधान की दिशा में पहल करने का विचार किया और इस तरह 1906 में मोरवी गुजरात में एक सम्मेलन का आयोजन करके जैन कॉन्फ्रेंस का गठन हुआ। दूरदृष्टा श्रावक महानुभावों ने संस्था का नामकरण किया अखिल भारतीय श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस ।

सम्मेलन से संघ तक की यात्रा

सन् 1933 में अजमेर सम्मेलन प्रथम बार हुआ और अन्य सम्मेलन भी समाधान की टोह में होते गए। सन् 1952 में सादड़ी मारवाड़ में श्रमण संघ की स्थापना, अक्षय तृतीया के पवित्र दिन हुई, फिर तो जैन कॉन्फ्रेंस रूपी मातृ संस्था का प्रयास चलता रहा, अजमेर, भीनासर, सोजत, पुनः अजमेर, पूना, इन्दौर में साधु सम्मेलन हुए। हमारे सर्वमान्य परम पूज्य चार-चार आचार्यों ने हमारा नेतृत्व किया, मार्गदर्शन किया और हमारे आचार्यों के साथ हमारे वर्तमान युवाचार्य श्री भी प्रतिष्ठापित हुए।

स्थानकवासी संम्प्रदायों के गठजोड़ के प्रयत्न भी इसी के साथ होने लगे। इन श्रावकों के अथक प्रयास को सफलता थोड़ी देर से ही सही, परन्तु सफलता मिल गयी। अनेकों श्रावक एवं साधु सम्मेलनों के पश्चात् 1952 में अक्षय तृतीया के पावन दिवस पर स्थानकवासी संम्प्रदायों की अधिकतम संम्प्रदायों का एक बड़ा संघ बना जिसके निमार्ण में अनेकों महापुरुषों के निर्मल, निःस्वार्थ त्याग ने अमृत सिंचन का काम किया और इस तरह श्री वर्धमान स्थानकवासी श्रमण संघ का उदय हुआ। इस सारी प्रक्रिया में जैन कॉन्फ्रेंस का प्रबल पुरुषार्थ और अनेकों साधु साध्वी जी के त्याग का सहयोग रहा और इस तरह जैन कॉन्फ्रेंस श्रमण संघ की मातृ संस्था बनी। आचार्य सम्राट श्री आत्मारामजी महाराज, आचार्य सम्राट श्री आनंदऋषिजी महाराज, आचार्य सम्राट श्री देवेंद्रमुनिजी महाराज द्वारा कुशलता पूर्वक संचालित श्रमण संघ अब वर्तमान आचार्य सम्राट, ध्यान योगी डॉ. श्री शिवमुनिजी महाराज के ध्यान सिंचित कुशल हाथों में है।

वर्तमान विस्तार और गौरव

कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक श्रमण संघ व जैन कॉन्फ्रेंस का विस्तार है। जैन कॉन्फ्रेंस की गौरवमयी यात्रा में शामिल होना गौरव की बात है। पांच जोन और प्रांतों के हजारों पदाधिकारी और सदस्य एक संगठन के रूप में आपसी तालमेल से जिन शासन विकास यात्रा को मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं। कॉन्फ्रेंस की मुख्य कार्यकारिणी समिति, युवा समिति एवं महिला समिति के रूप में जैन कॉन्फ्रेंस अपनी संगठन यात्रा और मजबूती से आगे बढ़ा रही है।

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