भीनासर साधु-सम्मेलन (सन् १९५६)
आचार्य श्री आत्माराम जी म. का सन्देश
सोजत में मंत्रीमंडल के अधिवेशन में जो निर्णय अपूर्ण थे, उन्हें पूर्ण करने हेतु किसी उपयुक्त क्षेत्र में साधु-सम्मेलन की आवश्यकता प्रतीत हो रही थी। आचार्य सम्राट् श्री आत्मारामजी महाराज इसके लिए चिन्तित थे। आचार्य सम्राट् ने इसके लिए उपाचार्य श्री, प्रधानमंत्री जी तथा अन्य मन्त्रिमंडल के साथ विचार-विमर्श कर संदेश भेजा। सबकी राय रही कि इस बार भीनासर में साधु-सम्मेलन का आयोजन रखा जाए।
उन्हीं दिनों पंजाबकेसरी प्रान्त मन्त्री श्री प्रेमचन्दजी महाराज भी वहाँ पधार गए। उसी दौरान आचार्य सम्राट् के द्वारा आगामी भीनासर साधु-सम्मेलन के सम्बन्ध में पूज्य श्री मरूधर केसरी जी से विचार-विमर्श करने हेतु बाबू रामजीभाई तथा लाला लक्ष्मणदास जी के नेतृत्व में भेजा हुआ एक शिष्टमण्डल आया। शिष्टमंडल ने भीनासर सम्मेलन की संभावनाओं के तथ्य प्रस्तुत किए और पूज्य गुरुदेव से सम्मेलन की तिथि के सम्बन्ध में पूछा। आपश्री ने आचार्य सम्राट् की सेवा में यह निवेदन करवा दिया कि भीनासर में साधु-सम्मेलन चैत्र कृष्ण ३ के बजाय फाल्गुण कृष्ण ३ को ही उचित एवं संभव हो सकेगा। शिष्टमंडल आपश्री का सन्देश लेकर लौट गया।
उसके पश्चात् आचार्य सम्राट् द्वारा भीनासर साधु-सम्मेलन की तिथि के सम्बन्ध में चैत्र शुक्ला १, संवत् २०१३ की घोषणा की गई। सभी मंत्री मुनिवरों एवं सन्तों के चरण उसी ओर बढ़ने लगे।
प्रधानमन्त्री मुनिराज से बातचीत एवं सहविहार
पौष कृष्णा ११ को श्री मरूधर केसरी जी म. प्रधानमंत्री श्री आनन्द ऋषिजी म. के साथ विहार करके जालिया पधारे। वहाँ रात्रि व्याख्यान के पश्चात् लगभग तीन घण्टे तक प्रधानमंत्री जी महाराज से आगामी भीनासर साधु-सम्मेलन के विविध पहलुओं पर गहराई से, उन्मुक्त हृदय से विचार-विनिमय हुआ। इसके पश्चात् जेवाजा कोटड़ा, बर, बरांटिया आदि क्षेत्रों को पावन करते हुए निम्बाज पधारे। यहाँ प्रधानमंत्री महाराज व आपका भव्य स्वागत हुआ। रावले के सामने खुले मैदान में दोनों महानुभावों का सार्वजनिक व्याख्यान हुआ। उसके पश्चात् आप दोनों जयतारण पधारे। वहाँ भी प्रधानमंत्री जी महाराज के साथ आपका व्याख्यान हुआ। इन सभी क्षेत्रों में आप दोनों महानुभावों में संघ ऐक्य के सम्बन्ध में विचार-चर्चा होती रहती थी।
भीनासर साधु सम्मेलन के पथ पर
विवरण पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि संतों का विहार जयतारण से राणीवाल, निम्बोल, बलूंदा, आनन्दपुर कालू, फालका, डिगरना, कुरडांया, गगराना, मेड़तारोड (फलोधी-पार्श्वनाथ), लांबा, देशवाल एवं खजवाना आदि होते हुए हुआ। खजवाना में मुनिश्री लालचन्दजी का पत्र शीघ्रातिशीघ्र नागौर पधारने का आया, उसी दिन स्वामी श्री हजारीमल जी का सन्देश कुचेरा पधारने का मिला। किन्तु अब कुचेरा वापस लौटकर जाने का समय नहीं था। अतः आपश्री मारवाड़ मूंडवा होकर सीधे नागौर पहुँचे।
सूचना मिलते ही स्थानीय श्रावक-श्राविकाएँ तथा स्वामी श्री चांदमल जी महाराज तीन सन्तों के साथ सुलपी दरवाजे के बाहर स्वागतार्थ आए। त्रिपोलिया होकर पूरे बाजार को पार करके स्वागत-सत्कार के साथ संतों ने नगर प्रवेश किया और ‘श्री जयमल्ल जैन श्रमणोपासक भवन’ में विराजे। इधर नागौर संघ के स्वयंसेवक भीनासर साधु-सम्मेलन में पधारने वाले सन्तों के स्वागतार्थ तैनात थे। पूज्य श्री मरूधर केसरी के साथ ४ स्वयंसेवक साथ जाने-आने के लिए नियुक्त कर दिए गए। वहीं प्रधानमंत्री श्री आनन्द ऋषि जी महाराज, सहमंत्री श्री प्यारचन्द जी महाराज, श्री छोगालाल जी महाराज आदि संत ठाणे ३० से और सतियाँ ठाणे ३५ से मिलन हुआ। वहाँ नोखामंडी, बीकानेर एवं जोधपुर के श्रावक दर्शनार्थ आए। वे यह सन्देश लेकर आए कि कविश्री अमरचन्द जी महाराज, श्री मदनलाल जी महाराज, श्री हजारीमलजी महाराज, श्री सुशीलकुमार जी एवं श्री सौभाग्यमलजी महाराज आदि संत शीघ्र ही नौखामण्डी पधारें, अन्यथा आप अपना प्रतिनिधित्व (प्रोक्सी) भिजवा दें, ताकि विचार-विमर्श करने में सुविधा रहे।
वहाँ पहुँचते ही उपाचार्य श्री जी और प्रधानमंत्री जी आदि भी पधार गए। माघ शुक्ला २, सोमवार को २५ ठाणे से ‘जैन जवाहर भवन’ में विराजमान हुए। दूसरे दिन और सन्त-सतियों का पदार्पण हुआ। अतः कुल मिलाकर ६५ सन्त एकत्र हो गए थे, करीब ३५ सतियाँ भी पधार गई थीं। व्याख्यान क्रमशः सभी सन्त फरमाते थे। पं. समर्थमल जी स्वामी भी पधार गए। यहाँ सन्तों की परस्पर विचार-गोष्ठी हुई व दण्डविधि का भी निर्णय हुआ।
फाल्गुन कृष्णा १ को भव्य स्वागत के साथ संत मंडल का देशनोक में पदार्पण हुआ। यहाँ लगभग ६७ सन्त और ८० सतियाँ एकत्रित हो गई थीं। यहाँ बीकानेर से श्रावक-श्राविका वर्ग भी दर्शनार्थ आता-जाता रहा। कुछ बातों के बारे में खुलकर चर्चा हुई। देशनोक से सभी संत उदयरामसर होकर गंगाशहर-भीनासर पधारे। यहाँ आपकी सेवा में मुनि आईदान जी नियुक्त थे। यहाँ करीब ६१ सन्त और ६० सतियाँ पधार गई थीं। यहीं पर दो दिन विराजकर फाल्गुन शुक्ला ५ को बड़े भव्य समारोह के साथ ४-४ सन्त-सतियों की पंक्ति में मुनि मंडल ने गोगागेट से बीकानेर नगर में प्रवेश किया। दोनों ओर असंख्य जन-समुदाय सन्त-समाज के स्वागतार्थ उपस्थित था।
बीकानेर की पंचरंगी पोशाकों में सजी हुई बीकानेरी जनता अपने आदरणीय गुरुजनों का स्वागत कर अपार हर्ष का अनुभव कर रही थी। नगर में जहाँ देखो वहीं, आबालवृद्ध महिला-पुरुष, सबके मुँह पर एक मात्र यही चर्चा थी कि “सन्तों का ऐसा भव्य समुदाय और इतना स्वागत इससे पूर्व हमने कभी नहीं देखा।” मुख्य-मुख्य बाजारों से होती हुई शोभा यात्रा सेठियाजी की कोटड़ी के पास आकर रुकी। सभी सन्तों ने जय-जयकार के साथ कोटड़ी में प्रवेश किया। शोभायात्रा व्याख्यान सभा में परिणित हो गई। समस्त सन्त समुदाय पट्टे पर विराजे और सभी संतों को सुविधानुकूल ठहराया गया। श्री हस्तीमल जी महाराज, श्री मरूधर केसरी जी महाराज, श्री सौभाग्यमल जी म., श्री चांद मुनिजी महाराज, श्री सुशीलकुमार जी म. और श्री छोगालाल जी महाराज आदि सन्त सेठियाजी की हवेली में विराजे। अन्य संत अनुकूल स्थानों पर विराजमान हो गए।
बीकानेर में सम्मेलन सम्बन्धी विचार-विमर्श
बीकानेर में एकत्रित सन्तों ने सम्मेलन के संबंध में विचार-विमर्श करना शुरू कर दिया। समाचारी सम्बन्धी अनेक मुद्दों पर पुनः चर्चाएँ उठीं। वे चर्चाएँ अनिर्णीत ही रहीं। परिस्थितियों की विषमता, साम्प्रदायिकता, राग-द्वेष, ईर्ष्या आदि का उन्मुक्त प्रभाव परिलक्षित हो रहा था, इसलिए बीकानेर में अधिक कार्य नहीं हो सका। कुछ ही दिनों बाद कवि श्री अमरचन्द जी महाराज, श्री मदनलालजी महाराज, श्री हजारीमल जी महाराज, स्वामी श्री रावंतमल जी महाराज, श्री फूलचन्द जी महाराज आदि सन्त भी यहाँ पधार गए। इस प्रकार कुल सन्त १३६ ठाणे और सतियाँ १४२ ठाणे से एकत्रित हो गए थे। इनके आने पर यहाँ के वातावरण में अनुकूलता होने लगी।
श्री मरूधर केसरी जी म. सब सन्तों से पहले भीनासर में संतों की आवास व्यवस्था हेतु फाल्गुन सुदी १५ को चार ठाणे से बीकानेर से भीनासर पधार गए। यहाँ सन्तों के आवास के लिए आपने चार स्थान नियत किए— चम्पालाल जी बांठिया का बाग, कन्याशाला, लूणियों की कोटड़ी और आंचलियों की कोटड़ी। आपने सभी सन्तों की यथायोग्य आवास व्यवस्था का पत्रक बना लिया और सभी पर अलग-अलग सन्तों के नामपट्ट अंकित करवा कर लगवा दिए।
चैत्र कृष्णा १ को सभी सन्तों ने चार-चार की पंक्ति में बीकानेर से भीनासर की ओर विहार किया। साथ में करीब १५ हजार श्रावक-श्राविकागण सेवा कर रहे थे। सभी सन्तों ने उत्साह, उल्लास और श्रावकवर्ग की श्रद्धाभक्ति के साथ भीनासर में प्रवेश किया। वहाँ पूर्वनिश्चित आवास-स्थान के अनुसार औषधालय का कमरा नं० १ में मंत्री श्री फूलचन्दजी म. ‘श्रमण’ ठा. ४, कमरा नं० २ में स्वामी श्री चांदमल जी और श्री मरूधर केसरीजी म. ठाणे ७, पास ही के हाल में मंत्री पं. शुक्लचन्द जी म. ठा. १०, द्वार के पास वाले कमरे में उपाचार्य जी म., कन्याशाला के बाँये मोड़ के कमरे में श्री हस्तीमल जी म. के दाहिने कमरे में प्रधानमंत्री श्री आनन्द ऋषिजी म., अन्दर के बंगले में, ऊपर के खण्ड में कवि श्री अमरचन्दजी महाराज एवं व्याख्यान वाचस्पति श्री मदनलालजी महाराज, नीचे के भवन में श्री रामकुमार जी महाराज, श्री शान्ति मुनिजी; साथ ही बने हुए मोटर गैरेज व लूणियों की कोटड़ी में दिवाकरीय सन्त समुदाय तथा श्री छोगालाल जी म., श्री सौभाग्यमल जी म., श्री जीवराजजी म. आदि सन्तों को; आंचलियों की कोटड़ी में बाँयी तरफ स्वामी श्री हजारीमल जी महाराज, श्री फतहचन्द जी महाराज एवं स्वामी श्री रावतमल जी महाराज आदि ठा. ६ और दाहिनी तरफ श्री प्रेमचंद जी महाराज, श्री ज्ञानमुनि जी, मुनि सुशीलकुमार जी आदि सन्तों की आवास-व्यवस्था की गई थी।
इसके अतिरिक्त उपाश्रय, स्थानक, बोथरों की कोटड़ी तथा महादेवजी के मन्दिर में सभी समागत सतियों का आवास-स्थान रखा गया। सामने ही सम्मेलन का विशाल नवनिर्मित पंडाल था। सम्मेलन में दर्शनार्थी श्रावक-श्राविका भी लगभग ३५ हजार की संख्या में एकत्रित हो गए थे, जिनमें अधिकांश मारवाड़ी लोग ही थे। कुछ पंजाबी श्रावक भी उत्साहपूर्वक संत-दर्शन हेतु बीकानेर पधारे थे।
सम्मेलन का सभा सम्बन्धी आयोजन
बांठिया भवन के बड़े हाल में मुनिवरों की परिषद् राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस (गोलमेज परिषद्) की तरह प्रतिदिन प्रातः और मध्यान्ह दो बार होती थी। श्रमण संघीय समस्त मुनिराजों के ५१ प्रतिनिधियों में से ४२ सम्मेलन में उपस्थित थे। प्रतिनिधि मुनिवरों की परिषद् के साथ दर्शक सन्त-सती भी बैठते थे। परिषद् में उपाचार्यश्री गणेशीलाल जी म. एवं शान्तिरक्षक व्याख्यान वाचस्पति श्री मदनलालजी म. चुने गए थे। इन्हीं की आज्ञानुसार केसर बहन झवेरी, धीरजभाई तुरखिया और लालचन्द जी मुणोत भी दर्शक मुनिवरों की परिषद् में बैठते थे। परिषद् के प्रवक्ता मुनिश्री आईदान जी थे और प्रस्तावक थे मरूधर केसरी जी महाराज।
संगठन को छिन्न-भिन्न करने का प्रयत्न विफल
सादड़ी और सोजत सम्मेलन के बाद कुछ लोगों ने श्रमणसंघ के संगठन को छिन्न-भिन्न करने का प्रयत्न शुरू कर दिया था। आश्चर्य तो इस बात का था कि कुछ लोग श्रमण संघ में रहकर भी अन्दर ही अन्दर उसे तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। “घर के चिराग से घर में ही आग लग रही थी।” भीनासर सम्मेलन में ध्वनिवर्द्धक यंत्र प्रयोग के सम्बन्ध में रस्साकस्सी चल रही थी। यदि उपाचार्यश्री जी महाराज और श्री मरूधर केसरीजी म. की उदारता को बल न मिला होता तो श्रमण संघ सम्भवतः तभी दो भागों में बँट जाता। यद्यपि ध्वनिवर्द्धक यंत्र के प्रयोग के विषय में संशोधनात्मक निर्णय किया गया था, फिर भी कुछ क्षेत्र-विशेष के संत व श्रावक उत्तेजना बनाए हुए थे।
श्रमणसंघ में भी कुछ लोग अस्थिरमति थे, जो संघहित की हर बात पर दोनों ओर लुढ़क जाते थे। बाहर में वे लोग संघहित का चोगा पहने रहते थे, किन्तु अन्दर में फूट की दरारें डालने में चूकते नहीं थे। अगर ध्वनिवर्द्धक यन्त्र के विषय में स्थिति पर नियंत्रण न किया जाता तो श्रमण संघ के दो टुकड़े होते देर न लगती। विरोधी लोग संघ को नष्ट-भ्रष्ट करने पर तुले हुए थे, लेकिन महान् परिश्रम और अनेक कुर्बानियों के बाद बने हुए संघ-संगठन को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अनेकों महात्मा सदा प्रयत्नशील थे। यही कारण था कि ध्वनिवर्द्धक यन्त्र-प्रयोग के संबंध में भी अन्ततः दोनों पक्षों में समाधान हो गया। इस दक्षता एवं सभा-संचालन चातुर्य के कारण ही श्री मरूधर केसरी जी म. संगठन की रक्षा कर सके। सभी सन्त लोग आपको नेता एवं श्रमण संघ का सूत्रधार कहने लगे थे।
सचित्त-अचित्त सम्बन्धी निर्णय
भीनासर सम्मेलन, सोजत मन्त्रीमण्डल-अधिवेशन में शेष रह गए कार्यों की पूर्ति के लिए आयोजित था। इसी उद्देश्य से इस सम्मेलन में सचित्त-अचित्त सम्बन्धी समस्त विवादास्पद प्रश्नों का निर्णय लिया गया।
संवत्सरी निर्णय
तिथिनिर्णायक समिति के कुछ विवादग्रस्त मसले हल न हो सके। इसलिए पूर्वोक्त समिति के बदले पुनः संवत्सरी निर्णय समिति का गठन किया गया। इसके १७ मुनि सदस्य निर्वाचित हुए। इस समिति के संयोजक पूज्य मरूधर केसरीजी म. बनाए गए। ध्वनिवर्द्धक यन्त्र के प्रयोग के सम्बन्ध में संशोधनात्मक निर्णय हो गया।
उपाध्याय पद
चार वरिष्ठ मुनिवरों को ‘उपाध्याय’ पद से विभूषित किया गया। जैसे— कवि श्री अमरचन्दजी महाराज, सहमन्त्री श्री हस्तीमलजी महाराज, प्रधानमंत्री श्री आनन्द ऋषिजी महाराज आदि। प्रधानमंत्री पद पर व्याख्यानवाचस्पति श्री मदनलालजी महाराज नियुक्त किए गए। अन्य प्रान्तीय मन्त्रियों का पद यथावत् रहा।
जैन जगत पर प्रभाव
भीनासर सम्मेलन की प्रतिक्रिया सर्वप्रथम तेरापंथ संघ पर पड़ी, और श्वेताम्बर मूर्तिपूजक समाज पर भी इसका सुदीर्घ प्रभाव हुआ। सादड़ी सम्मेलन में श्रमणसंघ बनने के बाद भूतपूर्व सम्प्रदाय, भूतपूर्व पद तथा भूतपूर्व कुछ परम्पराएँ बदल गईं। इनके बदलने के बाद सन्तों का मानस भी बदला। पहले जहाँ विभिन्न उपसम्प्रदायों के सन्तों में छोटी-छोटी बातों पर परस्पर दुराव, अलगाव, ईर्ष्या और विद्वेष की भावना को बल दिया जाता था, वहाँ अब श्रमण संघ बनने के बाद एक-दूसरे के प्रति सौहार्द, विनय, स्नेह, सेवाभाव एवं सहयोग-भाव में बहुत अंशों में वृद्धि हुई। यही सादड़ी सम्मेलन से लेकर भीनासर सम्मेलन तक की फलश्रुति है। भीनासर सम्मेलन के प्रारम्भ का वातावरण विषम होने पर भी उसका अन्त सुखद एवं सजीव वातावरण में हुआ।
चैत्र शुक्ला ११ को भीनासर सम्मेलन का कार्य सानन्द सम्पन्न हुआ। सम्मेलन के समापन के समय गंगाशहर-भीनासर एवं बीकानेर के श्री संघों को धन्यवाद दिया गया कि उनके संयुक्त प्रयत्नों से सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में जिन-जिन मुनिवरों ने जी-तोड़ प्रयत्न किया, उन सबको धन्यवाद दिया गया एवं उनके प्रति आभार व्यक्त किया गया। चैत्र शुक्ला ११ द्वितीय को सभी सन्त अपने-अपने दल सहित एक-एक करके विदा हुए।