श्रमण संघ का गठन एवं ऐतिहासिक प्रस्ताव
सादड़ी में आयोजित बहुप्रतिक्षित स्थानकवासी जैन श्रमण सम्मेलन लाखों लोगों की अन्तर-मनीषा को अभिव्यक्त करने वाली ऐसी श्वेत क्रांति थी, जिसका जन्म बिना पीड़ा भोगे नहीं हुआ; बल्कि अनेक अग्निधर्मा क्षणों को अपने आप में समेटे, समाधान का अमृत-मंथन बनकर प्रकट हुआ। उसी गाथा को, उसी कर्मवीरता भरे प्रयास को शब्द देने का यह विनम्र प्रयास है।
ज्ञानियों का कथन है कि मानव जीवन आशा और कल्पना का ऐसा संगम है, जहाँ सर्जन और पुरुषार्थ की असीम संभावनाएँ प्रतिक्षण उपलब्ध होती हैं। यही मानवीय जीवन की खास विशेषता है और यही मानवता की महत्ता भी। देवों को भी दुर्लभ यह रमणीयता जब-जब मानवीय जीवन में आती है, तब-तब मानव अपनी नियति और स्वप्न को गढ़ने का अवसर पा जाता है।
प्रखर ताप, चिलचिलाता सूरज, दूर तक फैली मरुधरा की रेत, पानी का अभाव और प्यास का धधकता अग्निकुण्ड — यह सब मिलकर एक ऐसे चमत्कारी घटनाक्रम का रूप ले रहे थे, जिसे लोगों ने न पहले इतिहास में पढ़ा था और न सुना था। पाली जिले के सादड़ी, मारवाड़ को यह श्रेय प्राप्त हुआ।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
आज से लगभग 74 वर्ष पूर्व, सन् 1952 में, जब श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन समाज की आस्था लगभग 32 सम्प्रदायों में विभाजित थी, तब क्रिया और मूलाचार ही नहीं, बल्कि व्यक्तित्व और प्रतिष्ठाएँ भी आपस में टकरा रही थीं। ऐसे कठिन समय में 32 में से 22 सम्प्रदायों के संत-साध्वीजी म. समन्वय के लिए स्वयं आगे आए — यह अपने आप में एक ऐतिहासिक और अनूठी घटना थी।
जिन महापुरुषों ने कभी आपस में परिचय तक नहीं किया था, वे उस दिन साथ बैठे और आहारादि का सेवन कर रहे थे। इससे समाज में जोश का तूफान उमड़ आया था। साधु सम्मेलन को सफलता की ओर बढ़ता देखने, दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगभग 70-80 हजार को पार कर गई थी।
यह वह समय था जब आज की तरह आवागमन के संसाधन सुलभ नहीं थे। फिर भी लोग अपनी आस्था को अभिव्यक्ति देने चले आ रहे थे। अनेक लोग प्रश्न करते थे कि जहाँ शहर जैसी सुविधा नहीं, रोशनी और राशन तक उपलब्ध नहीं, पीने के पानी का भी अभाव है, उस मरुभूमि सादड़ी को ही सम्मेलन के लिए क्यों चुना गया? ऐसे उपालंभों के बीच भी जैन कॉन्फ्रेंस के समर्पित पदाधिकारी श्रद्धा, आत्मविश्वास और नैतिक साहस के साथ इस महान कार्य में जुटे रहे।
सादड़ी का सफल साधु सम्मेलन
जब यह सम्मेलन करने का निर्णय हुआ, तब समय कम था और मुनिराज सम्मेलन-स्थल से काफी दूर थे; किन्तु संघ-एक्य की जो प्रबल भावना उनके हृदय में लहरें मार रही थीं, उसके समक्ष यह दूरी अत्यन्त नगण्य थी।
वर्ष 1952 में वैशाख शुक्ला तृतीया अर्थात् अक्षय तृतीया को सादड़ी, मारवाड़ में यह महान एवं विशाल साधु-सम्मेलन आरम्भ हुआ। संगठन की भावना समाज में व्यापक रूप से व्याप्त हो चुकी थी। सर्वत्र सम्मेलन के प्रति जागृति थी। जो लोग कार्यवश पहुँच नहीं पा रहे थे, वे भी मन-ही-मन खिन्न थे।
हमारे कष्टसहिष्णु मुनिवर एवं महासाध्वियाँ अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना भीषण गर्मी में पैदल विहार करते हुए लक्ष्य-स्थल तक पहुँचे। सम्मेलन में पधारने वाले भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के संत परस्पर बड़ी उदारता और सहृदयता से मिलते थे। जैन कॉन्फ्रेंस के प्रयासों से संगठन की ऐसी पवित्र हवा चली कि पूर्व का द्वेष-भाव उड़ गया और सर्वत्र प्रेम का वातावरण फैल गया। सम्मेलन में 22 सम्प्रदायों के प्रतिनिधि उपस्थित हुए और सभी ने प्रेमपूर्वक कार्यवाही में भाग लेकर इसे यशस्वी बनाया।
तत्कालीन बंबई धारा सभा के स्पीकर, प्रमुख समाजसेवी एवं जैन कॉन्फ्रेंस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कुन्दनमलजी फिरोदिया ने कहा था:
“सम्मेलन में शांति, विवेक और शिष्टतापूर्ण जो कार्य हो रहा है, वह तो हमारी धारा सभा से भी अच्छा हो रहा है।”
यह सम्मेलन 11 दिन तक चला। लगभग 70,000 भाई-बहन दूर-दूर के गाँवों से दर्शनार्थ आए। सम्मेलन के व्यवस्थापकों की सुव्यवस्था से सभी लोगों को बड़ा आराम रहा। विशेष रूप से पूज्य श्री मरुधर केसरी जी म. इस सम्मेलन में रात-दिन जुटे हुए थे। क्षेत्र की दृष्टि से, व्यवस्था के लिए जो साधन जुटाए गए थे, वे निस्संदेह उल्लेखनीय और पर्याप्त थे।
सभी प्रतिनिधि मुनिराज लोंकाशाह जैन गुरुकुल के नवीन भव्य भवन में ठहरे हुए थे और वहीं उसके विशाल हॉल में उनकी बैठकें हुआ करती थीं। गुरुकुल भवन के आस-पास “वीर लोंकाशाह नगर” बसाया गया था, जहाँ अनेक विशाल तम्बू लगाए गए थे। सादड़ी का यह सम्मेलन निस्संदेह अत्यन्त सफल सम्मेलन था, जिसकी चर्चा कई दिनों तक चलती रही।
प्यास पर भारी प्रयास
उम्मीद से लगभग दोगुने लोगों के लिए चिलचिलाती गर्मी में पानी का प्रबंध करना सबसे बड़ी चुनौती थी। “वीर लोंकाशाह नगर” में आहार-भोजन की अपेक्षा पानी अधिक अनमोल था। आसपास के गाँवों की बावड़ियों, कुओँ, तालाबों, झीलों और झरनों से पानी लाने का प्रबंध किया गया। दूर-दूर से पनिहारिनों ने सिर पर घड़े रखकर पानी पहुँचाया। यह प्रयास अपने आप में अभूतपूर्व था।
सादड़ी निवासी वयोवृद्ध पत्रकार श्री मोहनलाल जी पुनमिया ने बताया था कि उन दिनों सम्मेलन की दैनिक रिपोर्टिंग की जाती थी और “धर्मवीर-लोकाशाह” नामक दैनिक बुलेटिन प्रकाशित होता था। लगभग पाँच हजार प्रतियाँ प्रतिदिन छपती थीं। इसमें केवल कार्यवाही का विवरण रहता था; निर्णयों पर टिप्पणी करने की मनाही थी।
सादड़ी में उपस्थित संत समुदाय
इस सम्मेलन में सभी सम्प्रदायों का विलीनीकरण हुआ और “श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ” की स्थापना हुई। एक आचार्य के नेतृत्व में एक ही समाचारी का निर्माण हुआ।
उपस्थित सम्प्रदाय एवं प्रतिनिधि
- पूज्य श्री आत्मारामजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 88, आर्या 81, प्रतिनिधि 4: उपाध्याय श्री प्रेमचंदजी महाराज, युवाचार्य श्री शुक्लचंदजी महाराज, व्याख्यानवाचस्पति श्री मदनलालजी महाराज, पं. मुनि श्री विमलचंदजी महाराज।
- पूज्य श्री गणेशीलालजी की सम्प्रदाय — मुनि 34, आर्या 71, प्रतिनिधि 5: पूज्य श्री गणेशीलालजी म., पं. मुनि श्रीमलजी म., पं. मुनि श्री नानालालजी म., पं. मुनि श्री सुमेरचंदजी म., पं. मुनि श्री आईदानजी म.
- पूज्य श्री आनन्दऋषिजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 16, आर्या 85, प्रतिनिधि 5: पूज्य श्री आनंदऋषिजी म., पं. मुनि श्री उत्तमऋषिजी म., कवि श्री हरिऋषिजी म., पं. मुनि श्री मोतीऋषिजी म., पं. मुनि श्री भानुऋषिजी म.
- पूज्य श्री खूबचंदजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 65, आर्या 38, प्रतिनिधि 5: पं. मुनि श्री कस्तूरचंदजी म., उपाध्याय श्री प्यारचंदजी म., श्री शेषमलजी म., पं. मुनि श्री मनोहरलालजी म.
- पूज्य श्री धर्मदासजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 21, आर्या 86, प्रतिनिधि 5: पं. मुनि श्री सौभाग्यमलजी महाराज, पं. मुनि श्री सूर्यमुनिजी महाराज, पं. मुनि श्री केवलमुनिजी महाराज, पं. मुनि श्री मथुरा मुनिजी महाराज, पं. मुनि श्री सागर मुनिजी महाराज।
- पूज्य श्री ज्ञानचंदजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 13, आर्या 105, प्रतिनिधि: पंडित मुनि श्री मोहनलाल जी महाराज।
- पूज्य श्री हस्तीमलजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 6, आर्या 33, प्रतिनिधि 2: पूज्य श्री हस्तीमल महाराज, पंडित मुनि श्री लक्ष्मीचंदजी महाराज।
- पूज्य श्री शीतलदासजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 5, आर्या 7, प्रतिनिधि 1: मुनि श्री छोगालालजी म.
- पूज्य श्री मोतीलालजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 14, प्रतिनिधि 2: पंडित मुनि श्री अम्बालालजी महाराज, पंडित मुनि कवि श्री शांतिलालजी महाराज।
- पूज्य श्री पृथ्वीचन्द्रजी म. की सम्प्रदाय — मुनि 13, प्रतिनिधि 1: उपाध्याय कविश्री अमरचन्द्रजी महाराज।
- पूज्य श्री जयमलजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 6, आर्या 26, प्रतिनिधि 2: पंडितमुनि श्री वृजलालजी महाराज, पंडितमुनि श्री मिश्रीमलजी महाराज “मधुकर”।
- पंडितमुनि श्री चौथमल महाराज (मारवाड़ी) — मुनि 6, आर्या 51, प्रतिनिधि 3: पं. मुनि श्री चांदमलजी म., पंडित मुनि श्री लालचंदजी म., उपाध्याय श्री जीतमलजी म.
- पूज्य श्री नानकरामजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 6, आर्या 8, प्रतिनिधि 1: पंडित मुनि श्री सोहनलालजी महाराज।
- पूज्य श्री अमरंचंदजी म. सम्प्रदाय — मुनि 7, आर्या 65, प्रतिनिधि 3: मंत्री मुनिश्री ताराचंदजी, स्थ. मुनि श्री नारायणदासजी म., पंडितमुनि श्री पुष्करमुनिजी म.
- पूज्य श्री रघुनाथजी महाराज की सम्प्रदाय — मुनि 2, आर्या 26, प्रतिनिधि 2: मंत्री मुनि श्री मिश्रीमलजी महाराज “मरुधर केसरी”, पंडित मुनि श्री रूपचंदजी महाराज “रजत”।
- पूज्य श्री चौथमलजी महाराज (मारवाड़ी) की सम्प्रदाय — मुनि 4, आर्या 7, प्रतिनिधि 1: पंडित मुनि श्री रूपचंदजी महाराज।
- पूज्य श्री स्वामीदासजी म. की सम्प्रदाय — मुनि 7, आर्या 16, प्रतिनिधि 2: पंडितमुनि श्री छगनलालजी म. (अनुपस्थित), पंडित मुनि श्री कन्हैयालालजी म.
- ज्ञातपुत्र महावीर संघीय — मुनि 3, आर्या 2, प्रतिनिधि 1: पंडितमुनि श्री फूलचंदजी महाराज।
- तपस्वी श्री रूपचन्दजी म. (जंगरावा) की सम्प्रदाय — मुनि 3, आर्या 4, प्रतिनिधि 1: पं. मुनि श्री सुशीलकुमारजी म.
- पंडितमुनि श्री घासीलालजी महाराज — मुनि 11, प्रतिनिधि 1: पं. मुनि श्री समीरमलजी महाराज।
- पूज्य श्री जीवनरामजी म. की सम्प्रदाय — मुनि 3, प्रतिनिधि 1: कवि श्री अमरचंद महाराज के शिष्य श्री विजयमुनिजी महाराज।
- बरवाला सम्प्रदाय (सौराष्ट्र) — मुनि 3, आर्या 18, प्रतिनिधि 1: पंडित मुनि श्री चम्पकलालजी महाराज।
कुल उपस्थित सम्प्रदाय: 22
मुनि: 341 | आर्याजी: 768 | प्रतिनिधि संख्या: 54 | अनुपस्थित: 2