सोजत सम्मेलन का श्रमण संघीय महत्व
सादड़ी सम्मेलन सम्पन्न करने के बाद जो कार्यक्रम अपूर्ण अवशिष्ट रह गए थे, उनकी पूर्ति करने के लिए श्री मरूधर केसरी जी म. ने आचार्यश्री, उपाचार्य श्री, प्रधानमंत्री श्री आनन्द ऋषिजी एवं अन्य मन्त्रियों के साथ पत्राचार द्वारा विचारों का आदान-प्रदान विशेष रूप से किया था। अवशिष्ट कार्यों को सम्पादन करने व निर्णीत प्रस्तावों को बल देकर क्रियान्वित करने के लिए प्रधानमंत्रीजी को प्रेरित करके मन्त्रीमंडल का अधिवेशन (सम्मेलन) बुलाने का अनुरोध किया गया। उन्होंने मंत्रीमंडल के अधिवेशन (सम्मेलन) कराने के लिए विविध क्षेत्रों को प्रेरणा दी, लेकिन किसी भी क्षेत्र से मंत्रीमंडल का अधिवेशन अपने क्षेत्र में कराने का आमंत्रण नहीं मिला। अतः प्रधानमंत्री श्री आनन्द ऋषिजी म. ने श्री मरूधर केसरी जी म. को सादड़ी में सूचित कराया कि— “आपका मारवाड़ में विशेष प्रभाव है, अतः मंत्रीमंडल के अधिवेशन के लिए किसी क्षेत्र को प्रेरणा देकर तैयार करें।”
प्रत्युत्तर में श्री मरूधर केसरी जी म. ने निवेदन करवाया कि यदि समस्त मुनिवरों की स्वीकृति हो तो सोजत में मंत्रिमंडल का अधिवेशन किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में आचार्यश्रीजी का प्रत्युत्तर आने पर सोजत संघ से चर्चा की जाएगी। यह पत्र पहुँचते ही प्रधानमंत्री श्री आनन्द ऋषिजी म. ने विश्वासपूर्वक श्री मरूधर केसरी जी को कोई प्रत्युत्तर तो नहीं भिजवाया, बल्कि ‘जैन प्रकाश’ में सुसंवाद रूप में सीधी विज्ञप्ति प्रकाशित करवा दी कि—
“चातुर्मास समाप्त होते ही पौषकृष्णा में मंत्रीमंडल का अधिवेशन सोजत में होना निश्चित हुआ है। अतः समस्त मंत्री मुनिवर और समितियों के सदस्य मुनिराज आदि चातुर्मास के पश्चात् सोजत की ओर ही विहार करा दें।”
इस विज्ञप्ति को पढ़ते ही सोजत संघ बड़े विस्मय में पड़ गया कि “सोजत संघ की ओर से यह आमंत्रण किसने दिया? संघ की प्रार्थना के बिना ही प्रधानमंत्री जी म. ने यह घोषणा कैसे प्रकाशित करवा दी?” कुछ सज्जनों ने यह आशंका प्रगट की कि शायद केवलचंद जी चौपड़ा ने ऐसी सूचना प्रकाशित करवा दी हो। अतः बम्बईतार देकर चौपड़ाजी को पूछा गया, जिसके प्रत्युत्तर में श्री चौपड़ा जी ने स्पष्ट लिखा कि “मुझे इस सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञात नहीं है।”
इस पर सारा संघ आश्चर्य और असमंजस में पड़ गया कि अब अगर सम्मेलन (मन्त्रीमण्डलीय अधिवेशन) नहीं करवाते हैं तो बात अच्छी नहीं लगती और करवाते हैं तो इतना व्यय-भार उठाना हमारे बलबूते से बाहर की बात है। अन्त में किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर कुछ प्रमुखों का एक शिष्टमंडल मरूधर केसरी जी की सेवा में सादड़ी पहुँचा। आपश्री को सारी स्थिति से अवगत कराया। इस पर गम्भीर विचार करके आपने फरमाया— “प्रिय भाइयों! मैंने तो यहाँ से प्रधानमंत्री जी को इस आशय की सूचना भेजी थी कि आपका प्रत्युत्तर आ जाने पर सोजत संघ से अधिवेशन के बारे में विचार-विमर्श किया जाएगा। परन्तु प्रधानमंत्री जी ने हम पर अति विश्वास के कारण कोई प्रत्युत्तर न देकर झटपट समाचार-पत्र में यह विज्ञप्ति प्रकाशित करवा दी। खैर, अब घबराने की कोई बात नहीं है। शासनदेव के प्रभाव से सब कुछ अच्छा ही होगा। चातुर्मास के पश्चात् मेरा विचार सोजत पहुँचने का है। तब वहाँ सोजत संघ से परामर्श करके यथायोग्य कर लिया जाएगा।”
आपके श्रीमुख से सारी बातें सुनने से सोजत संघ को स्थिति का यथार्थ ज्ञान हुआ। संघ प्रमुखों ने सोजत लौटकर सबको सूचित किया।
सोजत में मन्त्रिमण्डल-अधिवेशन (सम्मेलन) का चक्र गतिमान
पूर्व प्रसारित विज्ञप्ति के अनुसार मंत्रीमंडल के अधिवेशन का समय अत्यन्त निकट आता जा रहा था। इसलिए स्वामी श्री ताराचन्द जी महाराज ठाणे ६ से सोजत पधारे। अन्य सन्त भी चारों ओर से सोजत सिटी पधारने लगे। श्री मरूधर केसरी जी तथा मंत्री श्री पुष्कर मुनिजी ठाणा ५ से धारासणी, मालकोसणी एवं भावी होकर पीपाड़ पधारे। वहाँ सहमंत्री श्री हस्तीमल जी म. से मिले।
वयोवृद्ध स्वामी श्री पन्नालालजी महाराज का एक पत्र पीपाड़ से इस आशय का आया कि— “उचित समझें तो मेरा प्रतिनिधित्व मुनि श्री लालचन्दजी को प्रदान कर दें। मैं वृद्धावस्था एवं शारीरिक अस्वस्थता के कारण सोजत पहुँचने में असमर्थ हूँ।” अतः पूज्य गुरुदेव ने ४ दिन पीपाड़ में रह कर वहाँ से विहार कर दिया और सेठजी की रीयां में विराजित मुनि श्री लालचन्द जी को बावड़ी गाँव से सहमंत्री जी ने स्वामी श्री पन्नालाल जी महाराज के मंत्रित्व का प्रतिनिधित्व करने का सुसंवाद भिजवा दिया।
इसके बाद सहमंत्री श्री हस्तीमल जी महाराज, स्वामीश्री रावतमलजी महाराज, श्री पुष्कर मुनिजी और मरूधर केसरी जी आदि भूतपूर्व चार सम्प्रदायों के वरिष्ठ सन्त बिलाड़ा में एकत्रित हुए। दो दिन तक चारों के व्याख्यान भी सम्मिलित हुए। वहाँ से विहार करके सहमंत्री जी अटबड़ा में श्री प्रधानमंत्री श्री आनन्द ऋषिजी म. से मिलकर सोजत पधारे। मंत्री श्री पुष्कर मुनिजी आदि भी धारासणी होकर सोजत पधारे।
चंडावल में व्याख्यान की व्यवस्था जम ही रही थी कि सहसा सोजत से श्री चौपड़ाजी कार द्वारा श्री मरूधर केसरी जी की सेवा में उपस्थित हुए और आज ही सोजत पधारने की प्रार्थना की। अतः १८ मील लम्बा विहार करके आपश्री उसी दिन पौने तीन बजे सोजत पधार गए। दूसरे दिन सुबह उपाध्याय कवि श्री अमरचन्द जी म. के सम्मुख स्वागतार्थ चार मील पधारे। उन्हें वहीं आहार-पानी करवाकर विश्राम करवा दिया। शाम को चार बजे सुस्वागत के साथ उनका नगर प्रवेश करवाया।
दूसरे दिन श्री उपाचार्य श्री गणेशीलाल जी महाराज, प्रधानमंत्री जी महाराज, श्री फूलचन्दजी महाराज ‘श्रमण’ तथा श्री सुशीलकुमार जी आदि सौ सन्तों का स्वागत किया गया। एक बार तो सभी सन्तों के आहार-पानी तथा आवास की व्यवस्था कोट के मोहल्ले के स्थानक में की गई। उसके पश्चात् सुविधापूर्वक सबको पृथक-पृथक स्थानों पर पहुँचाया गया। तदनुसार पं. मुनि श्री शुक्लचन्दजी महाराज, स्वामी श्री रावतमलजी महाराज, स्वामी श्री ताराचन्दजी महाराज, मुनि श्री लाभचन्दजी, श्री चौथमलजी और पूज्य श्री मरूधर केसरी जी म. आदि सन्त बड़े स्थानक में; सहमंत्री श्री प्यारचन्दजी महाराज, श्री शेषमलजी महाराज आदि को सिंघवीजी की हवेली में; पूरणमल जी महाराज, श्री समरथमलजी महाराज आदि को शाहजी की पोल में; तथा श्री उपाचार्य श्री जी महाराज, कवि श्री अमरचन्द जी महाराज, व्याख्यान वाचस्पति श्री मदनलालजी महाराज, पंजाब केसरी श्री प्रेमचन्द जी महाराज, सुशीलकुमार जी, प्रधानमंत्री जी एवं सहमंत्री जी आदि ८५ सन्तों के आवास की व्यवस्था चौपड़ाजी की धर्मशाला में की गई। मंत्रणास्थल भी चौपड़ा धर्मशाला के बड़े हाल में ही रखा गया। श्रावकों का पंडाल श्री चौपड़ाजी द्वारा बनवाई गई गौशाला के प्रांगण में बनाया गया था।
उपस्थिति
इस मंत्री-मण्डलीय मुनि सम्मेलन (अधिवेशन) में कुल १३६ सन्त, १४२ महासतियाँ और लगभग २५ हजार श्रावक-श्राविकागण सम्मिलित हुए। अधिवेशन बड़े ही सुन्दर, सुखद तथा शांत वातावरण में सम्पन्न हुआ। खींचन वाले सन्तों में इस अधिवेशन में मैत्री सम्बन्ध रखा गया।
- तिथि निर्णायक समिति
- सचित्त-अचित्त निर्णायक समिति
- ध्वनि-विस्तारक यंत्र परामर्श समिति
उपरोक्त समितियों के कार्यकाल की अवधि बढ़ाई गई। सचित्त-अचित्त के विषय में कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय लिए गए। शेष समस्त निर्णय अगले अधिवेशन में प्रस्तुत करने को कहा गया। मंत्री महोदयों को विभिन्न विभागीय अधिकार के बदले अपने-अपने मनोनीत प्रान्त-प्रदेश के अधिकार दिये जाने का निर्णय हुआ। उन्हीं के सुपुर्द उक्त प्रदेश या प्रान्त में विचरणकर्ता मुनियों-साध्वियों के चातुर्मास, शेषकाल, विचरण, प्रायश्चित एवं अन्य प्रकीर्णक विभागों के अधिकार दिये गये। प्रान्त मंत्रियों का सीधा सम्बन्ध प्रधानमंत्री व आचार्य से रखा गया।
आगम संशोधन हेतु उपाचार्य श्री जी म., उपाध्याय कवि श्री अमरमुनिजी, सहमंत्री श्री हस्तीमलजी स्वामी, पं. समर्थमलजी महाराज और प्रधानमंत्री आनन्द ऋषिजी आदि सन्तों को मनोनीत किया गया तथा इस कार्य हेतु पाँच वरिष्ठ सन्तों का आगामी संयुक्त चातुर्मास जोधपुर में करने की स्वीकृति दी गई। इस अधिवेशन के अवसर पर कुछ विरोधियों ने वितण्डावाद फैलाने का प्रयास किया, किन्तु उनकी दाल न गली। सबको मुँह की खानी पड़ी। मंत्रीमंडल का अधिवेशन सभी दृष्टियों से पूर्ण सफल हुआ।
सभी सन्तों ने अधिवेशन की पूर्णाहुति-वेला में सोजत श्री संघ को उनकी कार्यक्षमताओं और प्रशंसनीय सेवाओं के बदले धन्यवाद दिया। विशेषतः पू. श्री मरूधर केसरी जी म. की कार्यक्षमता, प्रभाव और व्यक्तित्व के कारण अधिवेशन की सफलता का अधिकांश श्रेय आपको दिया और आभार प्रकट किया। माघशुक्ला पूर्णिमा को सभी सन्त-सतियों ने अपनी-अपनी मनोनीत दिशा में विहार किया।
प्रान्तीय महासती-सम्मेलन का प्रचार
विक्रम सं० २०१२ के चातुर्मास की पूर्णाहुति पर लोकाशाह जयन्ती के अवसर पर यह विचार-विमर्श किया गया कि हमारे स्थानकवासी समाज में अब साध्वियों ने शिक्षा एवं शास्त्रीय ठोस अध्ययन के क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति की है। कई क्षेत्रों में साधुओं की अपेक्षा साध्वियों ने काफी धर्म-प्रचार किया है। अतः इस प्रान्त में विचरण करने वाली साध्वियों को सुसंगठित करने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से ‘प्रान्तीय महासती सम्मेलन’ के प्रचारार्थ पं. जीवनलाल जी को भेजा गया।