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Shri All India Swetamber Sthanakwasi Jain Conference

Dwitiya Ajmer Sammelan

द्वितीय अजमेर साधु सम्मेलन

शिखर सम्मेलन के लिये अजमेर पदार्पण

अजमेर संघ ने शिखर सम्मेलन का बीड़ा तो उठा लिया, लेकिन अजमेर संघ उस समय तीन पार्टियों में विभाजित था— एक लाखन-कोटड़ी पंडाल का श्रावकसंघ, दूसरा मदारगेट का संघ, और तीसरा कल्याणमलजी वैद का ग्रुप, जो मकान को लेकर मतभेदग्रस्त था। जब तक ये तीनों गुट एकजुट व एकमत होकर एकत्रित एवं संगठित नहीं हो जाते, तब तक संघ की शक्ति बिखरी रहेगी। बिखरी हुई शक्ति से शिखर सम्मेलन जैसा भगीरथ कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं हो सकता।

अतः पू. श्री मरूधर केसरी जी म. ने आखिर अजमेर संघ को कहा— “या तो आप अपना संघ, जो तीन गुटों में विभक्त हो रहा है, एकजुट कर लें, अन्यथा हम सन्त लोग यहीं लोढ़ा-धर्मशाला में सम्मेलन करके चल पड़ेंगे। इसमें संघ की भी शोभा नहीं रहेगी और दूसरी सम्प्रदाय के लोगों को भी हँसी उड़ाने का मौका मिलेगा।” आपकी जोशीली सिंह-गर्जना सुनकर अजमेर संघ चौकन्ना हो गया। संघ ने तीनों गुटों की एक सम्मिलित मीटिंग बुलाई और उसमें बहुमत से अपना एक केन्द्रीय संगठन बना लिया।

नगर प्रवेश एवं सभा का आयोजन

सभी सन्तों के नगर प्रवेश की तिथि फाल्गुन वदी ३ निश्चित कर ली गई। उससे पूर्व अजमेर में प्रमुख सन्त-सतीगण ठाणा १०० पधार गये थे। श्री कस्तूरचन्दजी महाराज ठा. २७, पं. शुक्लचन्दजी महाराज ठा. ५, कवि श्री अमरचन्दजी महाराज ठा. ३, श्री अम्बालालजी महाराज ठा. ५, श्री कन्हैयालालजी महाराज ठा. ३, श्री ब्रजलालजी महाराज ठा. ३, श्री मोहनमुनिजी ठा. २, श्री सौभाग्यमलजी महाराज ठा. ५, पूज्य श्री मरूधर केसरी जी म. ठा. ५, श्री आनन्द ऋषिजी महाराज ठा. ७, श्री प्रेमचन्दजी महाराज ठा. ५, श्री फूलचन्दजी महाराज ‘श्रमण’ ठा. ७, भानु ऋषिजी ठा. २ आदि सन्त लोढ़ा धर्मशाला में पधार गये थे। फाल्गुन वदी ३ को प्रातः ठीक आठ बजे सारे सन्त लोढ़ा धर्मशाला से बाहर शहर में प्रवेश हेतु तैयार हो गए। श्री हस्तीमल स्वामी के पधारने में घण्टे भर की देर हो गई। अतः सभी सन्तों का ठीक ६ बजे प्रवेश हुआ। जनता अतिथि संतों से अपरिचित थी। आगे-आगे स्वयंसेवक दल चल रहा था, उसके पीछे सारा मुनिमण्डल, फिर महासती मण्डल और उनके पीछे श्रावक-श्राविकाओं का दल था। बड़ा मनभावन दृश्य बन पड़ा था।

अजमेर की जनता को सर्वप्रथम बृहत् साधु-सम्मेलन संवत् १६३३ के बाद इतने मुनिवरों के दर्शन और सेवा के लाभ का यह दूसरा अवसर मिला था। सारी शोभायात्रा पण्डाल में प्रवेश करते ही सभा के रूप में परिवर्तित हो गई। सन्त-सतियों एवं कुछ श्रावकों ने प्रासंगिक वक्तव्य देकर सभा विसर्जित की।

शिखर सम्मेलन का आयोजन पण्डाल के ऊपरी हॉल में होने वाला था। जिस शिखर सम्मेलन की प्रतीक्षा में सन्त-सतीगण कई दिनों से रत थे, उसका विक्रम सं० २०२० फाल्गुन वदी ३ को आहार-पानी करने के बाद ठीक डेढ़ बजे लगभग शुभारम्भ हुआ। प्रायः सभी पदाधिकारी सन्त शिखर सम्मेलन में उपस्थित थे।

सर्वप्रथम सर्वश्री आचार्य श्री आनन्द ऋषिजी महाराज, श्री कस्तूरचन्दजी महाराज, मन्त्री श्री पन्नालालजी महाराज, मन्त्री श्री शुक्लचन्दजी महाराज, श्री मरूधर केसरी जी महाराज, मन्त्री अम्बालालजी महाराज, पं. श्री मधुकरजी महाराज, उपाध्याय श्री प्यारचन्दजी महाराज, मन्त्री श्री पुष्कर मुनि महाराज की प्रोक्सी से मुनि श्री रूपचन्दजी महाराज ‘रजत’, उपाध्याय श्री हस्तीमलजी म., मोहनलालजी म., उपाध्याय कवि श्री अमरचन्द जी म., श्री सौभाग्यमलजी म., पंजाब मन्त्री श्री फूलचन्दजी म. ‘श्रमण’, मन्त्री श्री प्रेमचन्दजी म., स्वामी जी श्री जीतमल जी म. व लालचन्द म. की प्रोक्सी से श्री सुकन मुनिजी म. आदि १७ सन्तों द्वारा शिखर सम्मेलन की कार्यवाही प्रारम्भ की गई। सभी पदाधिकारी प्रमुख मुनिवरों ने अपने-अपने कार्य की पूर्वकालीन रिपोर्ट प्रस्तुत की। तत्पश्चात् मन्त्री श्री पन्नालालजी स्वामी द्वारा शिखर-सम्मेलन में विचारणीय विषयों की जो एक तालिका बनाई गई थी, वह प्रस्तुत की। उनमें से कई मुद्दों पर काफी बहस-मुवाहिसे हुए। तीन दिन की ६ बैठकों में सक्रिय कार्य अतीव मंथर गति से हुआ।

चौथे दिन मध्यान्ह में कुछ उत्तेजना फैल गई, जिससे सभा का कार्य स्थगित करके सभा विसर्जित की गई। रात्रिकालीन बैठक में कई तरह के विकल्प उठे। 

पहले दिन की उग्रता अब शान्ति में परिणित हो गई थी। उपाध्याय श्री हस्तीमल म. तथा श्री मधुकरजी म. के बीच जो तीक्ष्ण विवाद चल पड़ा था, उसका समाधान किया गया। इसी अवसर पर एक नवीन, किन्तु महत्त्वपूर्ण घोषणा आचार्य श्री जी की ओर से की गई। अब तक श्रमण संघ की सुव्यवस्था संभालने के लिए भू. पू. आचार्य श्री की ओर से जो मन्त्रीमण्डल बना हुआ था, जिसमें विभिन्न प्रान्तों के विभिन्न मन्त्री उस-उस प्रदेश में विचरण करने वाले साधु-साध्वियों की दीक्षा, चातुर्मास संकल्प, शेषकल्प, अध्ययन तथा प्रायश्चित्त आदि व्यवस्थाएँ संभालते थे। किन्तु मन्त्रीपद में कुछ राजनैतिक गन्ध आने लग गई थी तथा पद शास्त्रीय पदों से बहुत दूर जा पड़ता दिखाई दे रहा था। अतः शास्त्रीय पदों के निकटवर्ती एवं राजनैतिक दलबन्दी या गुटबाजी से ऊपर उठकर संघ-सेवा की भावना से अनुप्राणित ‘प्रवर्त्तक’ पद समस्त भू. पू. मन्त्रियों को प्रदान किये गये। अधिकार और कर्त्तव्य वे ही रखे गए, जो मन्त्रीपद के थे।

नये प्रवर्त्तक पद विभूषित सन्त

  • प्र. श्री पन्नालालजी महाराज
  • प्र. श्री अम्बालालजी महाराज
  • प्र. श्री मगनमुनिजी महाराज
  • प्र. श्री सूर्यमुनिजी महाराज
  • प्र. श्री पृथ्वीचन्दजी महाराज
  • प्र. श्री विनयऋषिजी महाराज
  • प्र. श्री शुक्लचन्दजी महाराज
  • प्र. श्री हीरालालजी महाराज
  • प्र. श्री लक्ष्मीचन्दजी महाराज

इसके साथ ही एक-एक प्रवर्त्तक के सहयोगी उप-प्रवर्त्तक दो से लेकर छह तक बनाए गए। इस दृष्टि से पू. श्री मरूधर केसरी जी की संघीय सेवाओं और संगठन के प्रति सतत जागरूकता को देखकर नव्य आचार्य श्री ने आपको धन्यवाद दिया। कुछ मुनियों को नये प्रवर्त्तक एवं उप-प्रवर्त्तक बनाया गया। इसके पश्चात् सभी प्रमुख मुनिवरों ने सर्वसत्ताधिकार आचार्य श्री जी को सौंपा, किन्तु साथ में ‘परामर्शदात्री समिति’ का गठन किया गया, जिससे परामर्श लेकर आचार्य श्री अपना आदेश जारी कर सकें।

परामर्शदात्री समिति के सदस्य

  • प्रवर्त्तक श्री मरूधर केसरीजी महाराज
  • श्री मिश्रीमल जी महाराज ‘मधुकर’
  • प्रवर्त्तक श्री अम्बालालजी महाराज
  • उपाध्याय कविरत्न श्री अमरचन्द जी महाराज
  • प्रवर्त्तक श्री फूलचन्दजी महाराज ‘श्रमण’
  • श्री कस्तूरचन्दजी महाराज
  • श्री प्रेमचन्दजी महाराज
  • प्रवर्त्तक श्री पन्नालालजी स्वामी

सभी ने सामयिक निर्णयों को लेकर वस्तुपरक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किये, जिसका समाज ने व्यापक समर्थन किया।

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